Authentic Tenali Rama Moral Stories In Hindi

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Tenali Rama Stories In Hindi:

गुलाबचंदजी की कढ़ाई:

एक दिन तेनाली रामा मंदिर में ब्राम्हण भोज देने के लिए, उनके पड़ोसी शास्त्रीजी के यहाँ बड़ी कढ़ाई लाने गए। तब शास्त्रीजी के पुत्र घर पे अकेला था, जिसका नाम था गुलाबचंद । गुलाबचंद को दुसरो को मुर्ख बनाने में बड़ा मजा आता था। तेनाली रामा ने उनसे बड़ी कढ़ाई माँगने पर गुलाबचंद ने रामा को दे दी। गुलाबचंद ने रामा से कहा की कढ़ाई संभालके ले जाना, क्योंकि कढ़ाई पेट से है।

दूसरे दिन तेनाली रामा ने मंदिर में भोज देने के बाद, अन्य बर्तनों के साथ कढ़ाई भी घर ले आया। कुछ देर पश्चात गुलाबचंद खुद चलकर रामा के घर आया और उनसे बर्तन माँगने लगा। रामा ने भी उनकी बड़ी कढ़ाई गुलाबचंद को दे दी।

कढ़ाई देने पर गुलाबचंद बोला कढ़ाई तो ठीक है लेकिन इसके बच्चे कहा है? तेनाली रामा ने कहाँ कैसे बच्चे मैंने तो कल बस कढ़ाई ली थी, और कढ़ाई के भी कभी बच्चे होते है क्या?

गुलाबचंद बोला, “हाँ, होते है कल कढ़ाई पेट से थी इसिलए, कल मैंने आपको कढ़ाई संभलकर ले जाने को कहा था।” कुछ समय बहस चलती रही लेकिन, कुछ भी करके गुलाबचंद मानने को ही तैयार नहीं था। तब रामा ने चार छोटी कटोरिया भी बड़ी कढ़ाई के साथ दे दी।

अब गुलाबचंद बहुत खुश हुआ, उसे लगा लोगों ने व्यर्थ में ही तेनाली रामा को सर पे चढ़ा रखा है। उसके जैसा बेवकूफ तो पुरे विजयनगर में नहीं है।

तेनाली रामा दूसरे दिन फिर उसी शास्त्रीजी के यहाँ बर्तन माँगने चले गए। उस दिन फिर से गुलाबचंद घर पे मौजूद था। गुलाबचंद को लगा चलो फिर से बकरा खुद आया है कसाई के यहाँ। उसने खुश होकर फिर से बर्तन तेनाली रामा को दे दिए। आज भी गुलाबचंद ने जाते समय संभलकर ले जाने को कहाँ। तेनाली रामा ने हँसते हुए कहाँ, “गुलाबचंदजी आप चिंता ना करे में आपके कढ़ाई को एकदम आराम से ले जाऊँगा।”

दूसरे दिन गुलाबचंद फिर से तेनाली रामा के घर अपने बर्तन माँगने चला गया। तब तेनाली रामा दुखी चेहरा करके बोला, “आपको, कैसे बताये कल रातको आपकी कढ़ाई प्रसवपीड़ा से मर गयी।”

अब गुलाबचंद बोला परेशान होकर बोला, “लेकिन, ये कैसे संभव है, कढ़ाई कभी मरती है क्या?”

तब तेनाली रामा बोला, “हाँ, क्या करे अब सच तो यही है।”
गुलाबचंद फिर से बोला, “आप क्या पागल हो गए है? कढ़ाई की भी कभी मृत्यू होती है भला? लाइए मेरी कढ़ाई मुझे वापस करिये।”

तब तेनाली रामा बोला, “अगर कढ़ाई पेट से हो सकती है, और कढ़ाई के बच्चे हो सकते है, तो कढ़ाई मर क्यों नहीं सकती?”

अब गुलाबचंद को सब कुछ समझ में आ गया। गुलाबचंद ने तेनाली रामा से माफ़ी मांगी और उनकी कटोरिया वापस कर अपनी कढ़ाई लेकर वापस चला गया।

सिख: कभी भी दुसरो को मुर्ख समझने या बनाने की भूल ना करें। ऐसा करने पर एक दिन दूसरों के लिए बनाये जाल में स्वयं ही फस जाओगे।

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एक मटकाभर अकल:

एक दिन पड़ोसी राजा गुर्रमखान ने विजय नगर राज्य में अपने दूत के हाथों एक चुनौती भिजवाई। पड़ोसी मुल्क से आए दूत ने महाराज श्री कृष्णदेवराय के सामने चुनौती पढ़ी।

चुनौती में पड़ोसी राजा ने एक संदेसा भेजा था, जिसमे लिखा था, “महाराज श्री कृष्णदेवराय के पराक्रम कि बहुत से किस्से सुने है। पर आज में आप के राज्य से बुद्धि मांग रहा हूँ। आपके राज्य में अगर किसी के पास एक मटकाभर अकल है, तो अगले पाँच महीनों के अंदर भेज दीजिए। अन्यथा हम समझ जायेंगे कि विजय नगर राज्य में किसी व्यक्ति के पास अकल नहीं बची।”

दरबार में एक से बढ़कर एक विद्वान थे। महाराज श्री कृष्णदेवराय ने सभी दरबारियों को पूछा, “हमारे दरबार में क्या है कोई ऐसा व्यक्ति जिसे इस गुत्थी का हल पता हो।”

सभी दरबार में जैसे सन्नाटा सा छा गया। तब महाराज कृष्णदेवराय ने अपने विशेष सलाहकार तेनाली रामा से पूछा, “रामा क्या तुम ये चुनौती पूरी कर सकोगे।”

तेनाली रामा ने कुछ क्षण सोचा और कहा, “हाँ महाराज, पर मुझे एक से डेढ़ महीने का समय लगेगा।”

महाराज ने कहा, “ठीक है! लेकिन डेढ़ महीने बाद इसका जरूर निकलना चाहिए।”

तेनाली रामा ने कहा, “जी महाराज!”

दरबार से घर आने पर झट से वह चुनौती सुलझाने के काम में लग गया।

पहले उसने तरबूज़ के ६-७ बीज लिए उन बीजों को रामा ने अपने घर के आंगन में बोया। फिर तेनाली रामा गया कुम्हार के यहाँ और वहाँ कुम्हार से पाँच मटके बनवाए। बनाने से पहले तेनाली रामा ने सभी मटकों का मुख छोटा बनवाया। मटके बनने के बाद रामा ने सारे मटके घर लाए।

तेनाली रामा तरबूज़ के चीज जहाँ लगाए वहाँ रोज पानी छिड़कता। जिसके कारण कुछ दिनों बाद बोए हुए तरबूज़ के बीजों से तरबूज बेल का बेल आया। धीरे-धीरे वह बेल बड़ा हो गया उसे अब फूल आने शुरू हो गए। रामा ने पाँचो मटकों में हर मटके के अंदर एक फूल बिना तोड़े डाल दिया।

उसके बाद तरबूज के बेल कि देखभाल कि, कुछ दिनों बाद फूल रखे हर मटके में मटके के आकार जितने तरबूज आ गए। फिर तेनाली रामा वो पाँचों तरबूजों से भरे मटके लेकर दरबार गया। दरबार में तेनाली रामा महाराज के अनुमति से उसमे से एक मटका और उसने लिखा पत्र पड़ोसी राजा को भिजवाने के लिए कहता है।

उस पत्र में तेनाली रामा ने लिखा था, “आपके चुनौती के मुताबिक आपके राज्य लिए एक मटकाभर अकल भिजवा रहा हूँ। आपके राज्य में अगर थोड़ी भी अकल बची हो तो, उस अकल का इस्तेमाल करके मटके को बिना तोड़े हमारे द्वारा भिजवाए अकल को बाहर निकाले और मटका वापस विजय नगर भेज दे। एक मटकाभर अकल अगर कम पड़े तो बता देना हमारे पास और चार मटके अभी भी शेष है।”

तेनाली रामा द्वारा भेजे इस करारे प्रत्युत्तर से पडोसी राजा गुर्रमखान चकित रह गया। महाराज श्री कृष्णदेवराय ने भी दरबार में तेनाली रामा को पुरस्कृत करके सन्मानित किया।

इसतरह तेनाली रामा ने अपने चतुराई का परिचय देते हुए, विजय नगर के गौरव और सम्मान कि रक्षा की।

सिख: कभी भी किसी और को नीचा दिखाने का प्रयास ना करे।

तेनाली रामा कि दलिया खिचड़ी:

एक शाम महाराज श्री कृष्णदेवराय और उनके सलाहकार तेनाली रामा नदी किनारे भ्रमण कर रहे थे। सरदी का मौसम चल रहा था, बाहर बहुत कड़ाके कि ठंड पड़ी थी।

महराज श्री कृष्णदेवराय ने तेनाली रामा से एक सवाल पूछा, “मनुष्य इंसानियत के ख़ातिर क्या कर सकता है?”

तेनाली रामा बोला, “महाराज मनुष्य इंसानियत के ख़ातिर तो नहीं लेकिन पैसों के लिए कुछ भी कर सकता है।”

महराज ने तेनाली रामा कि बातें सुनकर कुछ देर विचार किया और तालाब के पास जाकर एक उँगली पानी में डाली। पानी बहुत ठंडा था इसलिए झट से उन्होंने अपनी उँगली पानी से बाहर निकाली।

महाराज तेनाली रामा के बातें अस्वीकार करते हुए कहा, “रामा तुम कुछ भी कहते हो, अब कोई भी व्यक्ति पैसे के ख़ातिर इस बरफ जैसी इस ठंडे तालाब में पूरे रात भर खड़ा रह सकता है भला?”

तेनाली रामा बोला, “महाराज कोई भी ऐसा व्यक्ति जिसको धन कि बहुत ज्यादा आवश्यकता हो। ऐसा व्यक्ति इस दुष्कर कार्य को भी कर सकता है। ऐसे व्यक्ति कि आर्थिक स्थिति, उससे यह असंभव लगने वाला कार्य करवाएगी। क्योंकि, उसके लिए धन कमाना लिए प्राणों से भी अधिक महत्वपूर्ण बन चुका है।”

महाराज बोले, “नहीं रामा, मुझे नहीं लगता कोई पैसों के ख़ातिर पूरी रात इस नदी के श्वेत जल में खड़ा रह सकता है। अगर कोई व्यक्ति तुम्हारे बातों को सच कर के दिखायेगा तो में ऐसे व्यक्ति को दस हजार स्वर्णमुद्राएँ दूँगा। जिससे उसकी दरिद्रता हमेशा के लिए ख़त्म हो जाएगी।”

तेनाली रामा बोला, “ठीक है, महाराज! लेकिन ऐसे व्यक्ति को खोजने के लिए मुझे एक हफ्ते का समय चाहिए।”

महाराज बोले, “ठीक है!”

तेनाली रामा ने ऐसे व्यक्ति कि खोज करने के लिए पूरे राज्य में ढिंढोरा पिटवाया कि, “जो भी व्यक्ति तालाब के शीतल जल में पूरी रात सिर्फ एक अंगवस्त्र पहने खड़ा रहेगा उसे दस हजार स्वर्णमुद्राएँ पुरस्कार में दी जाएगी, हो!!”

जिसके कारण राज्य के हर व्यक्ति को इस खबर के बारे में पता चल गया।

तब एक माधव नाम का बूढ़ा व्यक्ति तेनाली रामा के पास आया। उसके कपड़े फटे हुए थे, वह मजदूरी करके अपनी बेटी और खुद का पेट भरता था। उसे अपनी बेटी कि शादी करवानी थी, जिसके लिए उसे बहुत अधिक धन कि आवश्यकता थी। तेनाली रामा उसे राज महल ले गया।

राज महल पहुँचने पर हर महाराज ने पूछा, “क्या तुम सच में तालाब के इस ठंडे जल में पूरी रात तक रहने के लिए तैयार हो?”

तब माधव ने कहा, “जी महाराज!”

फिर महाराज और तेनाली रामा कि उपस्तिती में, माधव ने शाम के समय नदी अतिशीतल जल में सिर्फ एक अंगवस्त्र पहने प्रवेश किया।

पूरी रात माधव पर नजर रखने के लिए दो पहरेदार तालाब के पास खड़े थे।
धीरे- धीरे रात हो गयी और घना अंधेरा छा गया। शरद ऋतु के उस कड़ाके कि ठंड में मानो माधव जिंदा लाश बन के तालाब में खड़ा था। उसका शरीर इतने ठंड के कारण संवेदन-शून्य हो गया। लेकिन फिर भी माधव ने हार नहीं मानी। आखिरकार, सुबह हो गयी और सूर्योदय के समय उस व्यक्ति को बाहर निकाला।

सुबह-सुबह तालाब के पास खड़े पहरेदार माधव को राज महल ले गए। महाराज ने पहरेदारों से पूछा, “क्या यह व्यक्ति सच में पूरी रात इतने सर्दी में खड़ा रहा?”

तब पहरेदारों ने कहा, “हाँ महाराज, पर….पर यह व्यक्ति पूरी रात तालाब के किनारे एक घर के बहार मशाल थी उसे देख रहा था। शायद उस मशाल कि ज्योति से इस व्यक्ति को इतने शीतल जल मे गर्माहट मिलती होगी।”

महाराज उस व्यक्ति से बोले, “तुम्हारी इतनी हिम्मत! तुम मुझे धोखा देने चले।”

महराज पहरेदारों कि बात सुन के अब माधव पर इतना क्रोधित हुए कि उसकी एक बात सुनने की लिए महाराज तैयार नहीं थे।

इसलिए महराज ने माधव को राज महल से उन पहरेदारों को कहकर निकाल दिया।

अब बेचारे माधव कि आखिरी उम्मीद था तेनाली रामा इसलिए वो उसके घर गया।

तेनाली रामा को पूरा मामला बताने पर रामा बोला, “आप दो दिन तक हमारे ही निवास्थान पर अतिथि बनकर रहे। में आपको विश्वास दिलाता हूँ, कि आपको न्याय जरूर मिलेगा”

दूसरे दिन तेनाली रामा दरबार नहीं गया। उसने एक पेड़ के डाली पर मटका लटकाया और उसी मटके के बहुत नीचे ज़मीन पर आग लगाई।

बहुत समय होने पर भी तेनाली रामा दरबार में उपस्थित नहीं हुआ इसलिए, उसे बुलाने के लिए एक संदेशवाहक को भेजा। तब संदेशवाहक रामा को बुलाने उसके घर गया। तब रामा घर के बाहर नीम के पेड़ के नीचे आग के पास बैठा था।

उसने संदेशवाहक से कहा कि, “महाराज से कहो कि, में अभी दलिया खिचड़ी बना रहा हूँ। वह बनने के बाद दलिया खा के ही दरबार आऊंगा।”

संदेशवाहक ने महाराज को संदेश सुनाया, महाराज बोले, “ठीक है! और कुछ देर प्रतीक्षा कर लेते है!”

देखते ही देखते एक प्रहर बीत गया, लेकिन तेनाली रामा का अभी तक कोई पता नहीं था। अब महाराज दरबार से प्रस्थान करके खुद जाके देखने का फैसला किया।

महाराज रामा के घर के प्रांगण में पहुँचने पर तेनाली के विचित्र हरकत से चकित रह गए।

महाराज ने रामा से पूछा, “रामा, तुम ये क्या कर रहे हो?”

तेनाली रामा ने कहा, “महाराज आप यहाँ पर, में तो बस दलिया खिचड़ी बनाके उसे खाकर बस निकल ही रहा था।”

महाराज बोले, “लेकिन तुमने ज़मीन पर जो आग प्रज्वलित कि है उसकी उष्मा पेड़ पर लटके उस मटके तक कैसे पहुँचेगी और तुम्हारा दलिया कैसे पकेगा।”

तब तेनाली रामा बोला, “क्यों नहीं पकेगा, महाराज! जरूर पकेगा!”

तेनाली रामा आगे बोला, “सरकार जब उस तालाब में खड़े इंसान को तालाब से इतने दूर मशाल से गर्माहट मिल सकती है, तो मेरा दलिया से भरा मटका तो उसके मुकाबले आग के बहुत ज्यादा करीब है। तो मेरे दलिया खिचड़ी को पकने के लिए उष्मा क्यों नहीं मिलेगी।”

अब महाराज को तेनाली रामा कि उस विचित्र हरकत का असली कारण पता चला।

तब महाराज ने कहा, “सच में रामा, हमने उस बूढ़े इंसान के साथ बहुत गलत किया। हम अभी दरबार जाके उस बूढ़े व्यक्ति को ढूंढने के लिए कहेंगे। और उसे उसके हक़ का पुरस्कार प्रदान करेंगे।”

तेनाली रामा ने कहा, “महाराज किसी को उस व्यक्ति के खोज में ढूंढने कि जरूरत नहीं। क्योकि, वह व्यक्ति हमारे ही घर में अतिथि बन के रुका है।”

तब महाराज और तेनाली रामा के साथ माधव भी दरबार गए। वहाँ जाते ही, उसे सबके समक्ष दस हजार सुवर्णमुद्राएँ से पुरस्कृत किया। तेनाली रामा ने बड़ी चतुराई से उस माधव को न्याय दिलाया था।

सिख: कोई भी बड़ा निर्णय लेने से पूर्व वह निर्णय सही है या नहीं इसकी अच्छी तरह से जाँच करनी चाहिए।

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प्रिय चीज:

विजयनगर राज्य के महाराज श्री कृष्णदेवराय कि दो पत्नियाँ थी। बड़ी महारानी का नाम था, चिन्नाबाई और छोटी महारानी का नाम था तिरुमलंबा। एक बार महारानी चिन्नाबाई पर महाराज बहुत ज्यादा क्रोधित को गए।

महाराज बोले, “आप आज के बाद मुझे अपना मुख कभी मत दिखाए। कल ही आप मायके प्रस्थान करें। फिर कभी वापस लौटने कि भूल मत करना।”

बादशाह का यह आदेश सुनकर महारानी चिन्नाबाई घबरा गयी। उन्हें महाराज का गुस्सा कैसे शांत करें कुछ समझ नहीं आ रहा था। फिर महारानी ने महाराज के सलाहकार तेनाली रामा कि याद आयी। महारानी चिन्नाबाई ने तेनाली रामा को राज महल बुलाकर उनसे उपाय पूछा। तेनाली रामा ने इस परेशानी से निकलने के लिए महारानी को एक युक्ती बताई।

महारानी मायके निकलने से एक दिन पहले शाम के समय जब महाराज अपने महल में थे तब जाके उनसे पूछा, “महाराज! में कल अपने मायके चली जाऊंगी पर जाने से पहले आप से एक बिनती करती हूँ। मायके में मेरा मन लगा रहे इसलिए, मुझे यहाँ कि मेरी एक प्रिय चीज़ लेने कि अनुमति मुझे दे।”

महाराज ने अनुमति देते हुए कहा, “ठीक है! तुम्हे जो चाहिए वो तुम लेके जाओ।”

महाराज कि अनुमति लेने के बाद महारानी वहाँ से चली गयी। रात के समय सोने के कुछ देर पहले महाराज को दूध लेने कि आदत से महारानी अच्छी तरह वाक़िफ़ थी। महारानी ने राज वैद्य से कहकर ऐसी जड़ीबूटी मँगवाई जो ग्रहण करने से कोई भी व्यक्ति दो से तीन दिन तक निद्रा में रहेगा। महारानी ने उस जड़ीबूटी का मिश्रण महाराज के दूध में मिलाया। जिसके कारण महाराज गहरी निद्रा में सो गए।

उसके बाद महाराज को एक पालखी में बिठा कर महारानी ने मायके प्रस्थान किया। दो दिनों पश्चात महारानी मायके पहुँची। तीसरे दिन महाराज निद्रा से उठ गए। तो उन्होंने देखा, महल का माहौल कुछ बदला-बदला सा है। उठकर देखने के बाद पता चला कि वो अपने ससुराल में थे। कुछ समय बाद महारानी महाराज के लिए पानी लेकर आयी।

महाराज ने महारानी से पूछा, “ये सब क्या है महारानी, में यहाँ कैसे आया।”

महारानी ने जवाब दिया, “याद है महाराज, मैंने आपसे मेरी प्रिय चीज लेने कि अनुमति माँगी थी।”

महाराज बोले, “हाँ- हाँ, याद है!”

महारानी ने कहा, “मेरी विजय नगर में सबसे प्रिय चीज आप हो महाराज! इसलिए, मैंने आपको अपने साथ अपने मायके लाया है।”

महारानी का यह जवाब सुनकर महाराज महारानी से खुश हो गए। इस युक्ती के कारण महाराज और महारानी फिर से एक हो गए।

कुछ दिन महारानी के साथ ससुराल रहने के बाद महाराज और महारानी ने साथ में विजय नगर के लिए प्रस्थान किया। ससुराल निकलते समय महाराज ने मुस्कुराके मन में कहा, “मुझे यहाँ लाने कि तरकीब तो सिर्फ रामा ही निकाल सकता है।”

सिख: पति-पत्नी के बीच कोई नाराज़ होना आम बात है। लेकिन, किसी एक ने दूसरे को मनाने के लिए अलग-अलग तरीके अपनाना बहुत खास बात होती है।

मूर्तियों कि श्रेष्ठता:

हिंदुस्तान के इतिहास में एक दिन ऐसा आया, जब महाराज श्री कृष्णदेवराय के पराक्रम और तेनाली रामा कि बुद्धि का डंका पूरे हिंदुस्तान में बजने लगा। एक बार ईरानी राजा इस्माइल ने तेनाली रामा कि बुद्धि की परीक्षण करने का फैसला किया। तेनाली रामा के लिए चुनौती कठिन से कठिन हो इसका ध्यान रखते हुए ईरानी राजा इस्माइल ने खुद दिमाग लगाकर एक चुनौती तैयार की। चुनौती का गठन करवाने के लिए उसने उसके राज्य के कुशल मूर्तिकार को बुलवाया।

ईरान के राजा इस्माइल ने मूर्तिकार से एक जैसी तीन मूर्तियां बनवायीं। उसके बाद राजा इस्माइल ने उन तीनों मूर्तियों को एक पत्र के साथ को विजय नगर भेज दिया। विजय नगर पधारे ईरानी दूतों में से एक ने विजय नगर के दरबार में वह पत्र पढ़ा।

पत्र में लिखा था, “विजय नगर के महाराज श्री कृष्णदेवराय को प्रणाम! आपके विजयगाथाओं के साथ हमने तेनाली रामकृष्णा के चतुराई भरे किस्से सुने थे। इसलिए हमारी तरफ से उनके लिए एक खास चुनौती है। ये तीनों मूर्तियां जो आपको बिल्कुल एक जैसी दिखाई दे रही है। इन तीनों मूर्तियों को अच्छी तरह से जाँच कर आपको मूर्तियों में कौन सी मूर्ति सर्वश्रेष्ठ, मध्यम, और निम्न स्तर कि है ये तय करना है और साथ में उसका कारण भी बताना है। आपके जवाब का हमें बेसबरीसे इंतजार रहेगा। -शाह इस्माइल, पर्शियाके शहंशाह”

संदेसा पढ़ने के बाद तीनों दूतों ने तीन मूर्तियां महाराज श्री कृष्णदेवराय के सामने पेश कि।

फिर महाराज ने तेनाली रामा को बुला कर कहा, “रामा, इन मूर्तियों कि जाँच करके बताओ कि कौन सी मूर्ति सर्वश्रेष्ठ, मध्यम, और निम्न स्तर कि है”

तेनाली रामा ने कुछ समय बहुत बारीकी से निरीक्षण करने पर पता चला कि तीनों मूर्तियों के कान में बहुत छोटा छेद था।

अब रामा ने सोचा ऐसा क्या लेकर देखूँ जो इस छोटे से छेद में आसानी से जा सके। तब तेनाली रामा ने एक तार लेकर हर मूर्ति के कान वाले छेद में डालकर देखा। पहले मूर्ति के कान में डालने पर वह तार उस मूर्ति के दूसरे कान से बाहर निकली। दूसरे मूर्ति के कान में तार डालने पर उस मूर्ति के मुँह से वह बाहर निकली। वही तीसरे मूर्ति के कान में तार डालने पर वह सीधे उस मूर्ति के पेट में चली गयी।

यह देखकर तेनाली रामा ने मुस्कुराते हुए कहा, “महाराज! इन मूर्तियों कि श्रेष्ठता अलग-अलग प्रकार के मनुष्यों के गुणों पर आधारित है। पहले मूर्ति के कान में डाली तार उस मूर्ति के दूसरे कान से बाहर आयी। मतलब ऐसे गुण वाला व्यक्ति जो एक कान से सुनकर दूसरे कान से छोड़ देता है। दूसरी प्रकार कि मूर्ति के कान में डाली तार उसके मुँह से बाहर आयी इसका मतलब ऐसे गुण वाला व्यक्ति जो भी सुनता है वह सीधा बोल देता है। तीसरे मूर्ति में तार सीधे पेड़ में गयी यानि ऐसे गुण वाला मनुष्य हर कहे बात को पेट में रखता है।”

तेनाली रामा ने आगे कहा, “इन गुणों को परखते हुए, क्योंकि पहले मूर्ति के गुण वाला मनुष्य एक कान से सुनकर दूसरे कान से निकाल देता है। ऐसा करना उचित नहीं क्योंकि जो भी जानकारी उसे भविष्य में काम आ सकती थी वो ऐसे व्यक्ति को नहीं मिलेंगी। लेकिन ऐसे प्रकार के व्यक्ति पर दूसरों कि नकारात्मक बातों परिणाम नहीं होता जो एक अच्छी बात है। इसलिए पहली मूर्ति मध्यम स्तर कि है।”

तेनाली रामा ने दूसरे मूर्तिके बारे में कहा, “दूसरे मूर्ति के गुण वाला मनुष्य, अपने कानों से जो भी सुनता है, वो अपने मुँह से बकबक करता रहता है। ऐसा मनुष्य जहाँ भी जाता है एक-दूसरे कि बातें यहाँ से वहाँ सुनाकर दो व्यक्तियों के बीच दरार पैदा करता है। ऐसे गुण वाला व्यक्ति दूसरों कि बातें नही सुनता और हमेशा अपनी बातें सही साबित करने में लगा रहता है। जो कि एक निम्न स्तर का गुण है। इसलिए, दूसरी मूर्ति निम्न स्तर कि है।”

तेनाली रामा ने तीसरे मूर्ति के बारे में कहते हुए कहा, “वही तीसरे मूर्ति के गुण वाला मनुष्य अपने कानों से जो भी जानकारी सुनता है वह अपने पेट में रखता है। ऐसा व्यक्ति उचित समय आने पर सुनी जानकारी का सही से इस्तेमाल करता है। ऐसा व्यक्ति जीवन में बड़ी-बड़ी उपलब्धियाँ हाँसिल करता है। इसलिए, तीसरी मूर्ति तीनों में सर्वश्रेष्ठ है।”

तभी दरबार में से एक विद्वान ने पूछा कि, “रामाजी अभी आपने कहा कि, जो व्यक्ति कान से सुनी बात को दूसरों के सामने बड़बड़ाए ऐसे व्यक्ति कनिष्ठ जब की, जो व्यक्ति अपनी जानकारी पेट में रखे वो सर्वश्रेष्ठ, तो मेरा सवाल ये है कि, अध्यापक तो जो भी उन्होंने सुना होता है, अपने पाठकों को बता देते है। तो क्या अध्यापक निम्न सभी श्रेणी में आते है?”

तेनाली रामा ने कहा, “नहीं श्रीमान, मैंने कहा निम्न गुण वाला व्यक्ति अपनी सुनी हर बात को यहाँ से वहाँ सुनाते जाता है। जबकि सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति अपनी बातें पेट में तो रखता है लेकिन, उचित समय आने पर ही उसका प्रयोग भी करता है। श्रीमान बातें कुछ किसी भी प्रकार की हो सकती है लेकिन, अध्यापक अपने विषय से संबंधित बातें अपनी आने वाली पीढ़ियों को पता चले इसलिए, अपने पाठकों के साथ साझा करते है। इसलिए, अध्यापक भी अपनी जानकारी उचित समय पर ही अपने छात्रों को बताते है। यानि सभी अध्यापक सर्वश्रेष्ठ कि श्रेणी में ही आते है।”

सिख: कान पर पड़ी हर जानकारी को सही समय पर प्रयोग करने में ही अक्लमंदी है।

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बिल्ली का खाना:

विजय नगर सम्राट श्री कृष्णदेवराय के राज्य के खेतों एक साल चूहों कि संख्या बहुत बढ़ गयी। जिसके वजह से महाराज श्री कृष्णदेवराय परेशान थे। तब महाराज को इसपर एक उपाय सुझा उन्होंने अपने राज्य के सभी प्रतिष्ठित लोगों को एक-एक बिल्ली भेट दी। हर एक व्यक्ति को बिल्ली के साथ एक गाय दी। महाराज ने सभी को बिल्ली का अच्छी तरह से पालन करने के लिए कुछ निर्देश दिए थे। उसमे से एक आदेश यह था कि बिल्ली को रोज आपको भेट दिए गाय का दूध पिलाना है।

तेनाली रामा दरबार में एक प्रतिष्ठित व्यक्तियों में एक था। इसलिए, उसे भी एक बिल्ली के साथ गाय भेट में मिली थी। राज्य के सभी प्रतिष्ठित व्यक्तियों ने महाराज के आदेश मुताबिक अपने बिल्ली को दी गयी गाय का दूध पिलाया।

इधर तेनाली रामा के दिमाग में एक कल्पना आयी। उसने उसके बिल्ली के दाहिने पैर में निशान के तौर पर कपड़ा बाँधा। उसके बाद तेनाली रामा ने बिल्ली अपने खेत में छोड़ दिया।

छह महीने बीत गए लेकिन फिर भी खेतों में चूहों का आतंक कायम था। तब महाराज ने उन सभी प्रतिष्ठित लोगों को बिल्लियों के साथ दरबार बुलाया। कब उसी दिन तेनाली रामा ने खेत में जाकर बिल्ली के पैर में बाँधे हुए निशान कि मदत से बिल्ली को ढूँढा और घर लेकर आया। महाराज ने प्राणियों के खास वैद्य को बुलाकर बिल्लियों का निरीक्षण करने के लिए कहा। वैद्य ने दरबार में महाराज के समक्ष जाँच शुरू की।

हर एक कि बिल्ली गाय का दूध पीकर बड़ी हो गयी थी। अब वैद्य ने तेनाली रामा के बिल्ली का परिक्षण किया। तो पाया सभी बिल्लियों में तेनाली रामा कि बिल्ली सबसे ज्यादा तंदुरुस्त और बड़ी थी।

तब महाराज ने तेनाली रामा से कहा, “वाह रामा वाह! जाँच से पता चल रहा है कि, तुमने बिल्ली को सबसे ज्यादा दूध पिलाकर उसकी देखभाल की। इसलिए, में तुम्हें दस और गाय भेट देना चाहता हूँ।”

तेनाली रामा बोला, “महाराज लेकिन मैंने तो अपनी बिल्ली को गाय का दूध पिलाया ही नहीं।”

महाराज बोले, “रामा, ये तुम क्या बोल रहे हो? अगर तुमने दूध नहीं पिलाया तो यह बिल्ली इतनी स्वस्थ कैसे दिखाई दे रही है।”

तेनाली रामा को महाराज ने सभी को बिल्ली देने का असली मक़सद पता था।

इसलिए, तेनाली रामा आगे बोला, “महाराज! आपने चूहों कि समस्या दूर करने के लिए हमें बिल्ली तो प्रदान कि। लेकिन सभी बिल्लियों ने दूध पीने के बाद दूसरा कुछ खाया ही नहीं। क्योंकि हर बिल्ली को पता था कि, शिकार नहीं करने पर भी उसे दूध तो अवश्य मिलेगा ही।”

रामा आगे बोला, “दूसरी ओर, मैंने अपनी बिल्ली को अपने खेत में छोड़ा था। वहाँ बिल्लियों का क़ुदरती खाना यानि सैकड़ों चूहे थे। अगर मेरे बिल्ली ने शिकार नहीं कि होती तो उसे खाना ही नहीं मिलता। इसलिए, शिकार करना उसके लिए जरुरत बन गयी। और क्योंकि चूहों कि तादाद बढ़ गयी थी, मेरी बिल्ली को आसानी से अपनी शिकार भी मिल रही थी।”

तेनाली रामा आगे बोला, “खेतों में से चूहों कि शिकार होने से हमारे खेत में चूहों कि तादाद कम हो गयी और फसल का नुक़सान भी नहीं हुआ। प्रकृति ने हर जीव के लिए खाद्य पहले से निर्धारित किया है। और गाय का दूध तो आज-कल इंसान को नसीब नहीं होता। तो क्या गाय का दूध बिल्ली को देना सही रहेगा, महाराज!”

महाराज के साथ सभी दरबारी होकर तेनाली रामा कि बातें सुन रहे थे। रामा के चतुराई भरे जवाब से महाराज प्रसन्न हुए।

अब महाराज बोले, “रामा तुमने सत्य कहा! मैंने बिल्लियों के स्वस्त रहने हेतू सभी को गाय प्रदान कि थी। लेकिन असल में बिल्लियों का खाद्य तो चूहे ही है, जो उन्हें तंदुरुस्त भी रखेंगे। मुझसे ही थोड़ी समझने में थोड़ी गड़बड़ी हो गयी।”

महाराज ने तेनाली रामा को उसकी चतुराई के लिए खुश होकर और दस गाय भेट में दे दी।

सिख: कोई भी विचार कार्यान्वित करने से पहले अच्छे से उसके परिणाम के बारे में सोचना चाहिए।

I hope you liked and enjoyed the memorable Tenali Rama stories in Hindi with moral.

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