8 Panchatantra Stories In Hindi With Moral

Hi, my name is Ashish and I am going here to start new series of Panchatantra stories in Hindi.

New Panchatantra stories in Hindi:

एकता कि ताकत:

बच्चों आज में आपको जो कहानी सुनाने जा रहा हूँ, वह कहानी का शीर्षक है “एकता की ताकत”। जिसे सुनकर आप भी एकता के बल को समझ सकेंगे।

यह कहानी शुरू होती है एक घने जंगल से जहाँ एक कबूतर और चूहा रहता था। दोनों एकदम विपरीत जगहों पर रहने के बावजूद सभी यह देखकर हैरान थे की, इन दोनों की दोस्ती आखिर हुई कैसे?

एक दिन कौवा उन दोनों के पास जाकर बोला, “आप दोनों मुझे अपना दोस्त बना लो, मैं हर समय आपके सहयोग के लिए तैयार रहूँगा।”

उसकी बात सुनकर चूहा बोला कि, “कौवा चूहे की दुश्मनी तो सबको पता है। तो भला हम तुम पे विश्वास क्यों करें?”

यह बात सुनकर कौवा दोनों के सामने बिनती करने लगा कि और कहा, “अगर तुम दोनों मुझे अपना दोस्त नहीं बनाओगे तो में यही बिना कुछ भी खाये अपने प्राण छोड़ दूँगा।”

कौवे ने दोनों को बार-बार मनाने पर आखिरकार कबूतर बोला, “ठीक है चलो हम तुम पर विश्वास करके तुम को अपना दोस्त मान लेते है।” इस प्रकार वह कौवा कबूतर और चूहे का दोस्त बन गया।

समय यूं ही बीतता गया अब तक के अनुमान से उन्होंने देखा की कौवा तो बहुत ही अच्छा दोस्त है। कौवा हमेशा उन दोनों की मदत करने के लिए तैयार रहता और दोनों को बहुत प्यार भी करता था। कौवा, कबूतर और चूहा तीनों साथ में मिलकर खूब मजे करते थे। तीनों सुख- दुख में एक दूसरे का साथ भी देते थे।

कुछ साल बाद एक साल में बहुत बुरा अकाल पड़ा जिसके कारन सभी प्राकृतिक जल स्त्रोत सूखने लगे। अकाल के कारन घास, हरे-भरे पेड़ भी सूखने लगे। जिसके कारन सभी जानवरों को खाना जुटाने में मुश्किल होने लगी।

तब इस मुश्किल हालात में कौवा अपने दोस्तों से बोला, “दोस्तों अब यहाँ पर रहना मुझे उचित नहीं लगता, हमें वह जंगल छोड़ दूसरे जंगल प्रस्तान करना चाहिए। में पासवाले एक जंगल से परिचित भी हूँ, जहाँ पर मेरा एक दोस्त भी रहता है। और तो और वहाँ खाने-पिने की भी तकलीफ उठानी नहीं पड़ेगी। क्योंकि वहाँ खाने-पिने के लिए बहुत कुछ प्राप्त हो सकता है। वैसे भी वहाँ पर हमारी सहायता करने में मेरा दोस्त भी काम आ सकता है।”

कुछ समय सोचने के पश्चात कबूतर और चूहे ने कौवे की बात मान ली। और तीनों जंगल को छोड़ दूसरे जंगल निकल पड़े।

कौवे ने जल्दी पहुँचने हेतु चूहे को अपने चोंच में पकड़कर कबूतर के साथ उड़ने लगा। कुछ दिन की यात्रा पश्चात वह उन तीनों ने पासवाले जंगल में प्रेवेश किया। उनके लिए जंगल नया होने के कारन अब तीनों और अधिक सावधानी से उड़ने लगे।

वहाँ का जंगल देख उन्हें बड़ी ख़ुशी हुई क्योंकि वहाँ का जंगल सच में बहुत हरा-भरा था और खाने-पिने की कोई कमी नहीं थी। अब कौवा और कबूतर एक तालाब के पास पहुँच गए। तालाब के ही किनारे कौवे ने चूहे को निचे उतार कर जोर से अपने दोस्त को पुकारने लगा। कुछ देर पश्चात तालाब से एक कछुवा बाहर आया और उसने कौवे से कहा, “मेरे मित्र कितने दिनों पश्चात मिल रहे हो। कहो तुम कैसे हो? और कैसे आना हुआ? सब कुशल तो है न?”

तब कौवे ने उन तीनों की आपबीती कछुए को सुनाई। तब से चारो दोस्त हँसी- ख़ुशी उस तालाब के किनारे रहने लगे। ऐसे ही दिन बितते गए और एक दिन तीनों दोस्त तालाब के किनारे गप्पे मार रहे थे। तब अचानक से वह एक हिरन भागते- भागते उनके पास पहुँचा। वह हिरन बहुत थका और भयभीत लग रहा था और उसकी साँस फूलने से वह हाँफ रहा था।

तब कौवे ने उस हिरन से पूँछा, “ओ हिरन भाई, इतने हड़बड़ाए हुए कहा चले? और इतना डर किससे रहे हो?”

तुम जानते हो बहुत बड़ा संकट आने वाला है। क्योंकि, “कुछ दूर नदी किनारे राजा ने अपना डेरा लगाया है। उसके सैनिक बड़े निर्दयी है, वे शायद कल इधर ही शिकार करने आयेंगे। वह सैनिक किसी भी प्राणी को नहीं छोड़ते। इसलिए, अगर खुद की जान बचानी हो तो यहाँ से भागने में ही समझदारी है। वह लोग कल तक यहाँ शिकार करने आएँगे तो आप लोग भी जितने जल्दी हो सके यहाँ से निकल जाओ।”

हिरन की यह बात सुनकर चारों दोस्त परेशान हुए। उन चारों ने भी हिरन के उस जगह को छोड़ कही दूर जाने का निर्णय लिया।

वह पाँचों एक साथ दूसरी जगह जाने के लिए चल पड़े। लेकिन कछुवा बड़ा होने के कारण उसकी गति बहुत धीमी थी। इसके कारण वह सब कछुवे के साथ-साथ आगे बढ़ने लगे। कुछ समय पश्चात वह

क्योंकि वे लोग कल सुबह ही शिकार के लिए निकल जायेंगे , हमारे पास समय बहुत कम है। यह बात सुनकर सभी परेशान हो गए और चारों दोस्तों ने हिरण के साथ कही दूर चले जाने का निश्चय किया ।

लेकिन कछुवे का आकर और उसकी गति धीमी होने के कारण, सभी जानवर उसके साथ धीरे- धीरे आगे बढ़ने लगे। कुछ देर बाद सामने से एक शिकारी आ रहा था जिसकी नजर उस कछुवे पर पड़ी।

शिकारी तेज़ी से उसके पास आया। तब हिरन भाग गया, कबूतर और कौवा पेड़ पर चढ़ गया, चूहा बिल में चला गया। लेकिन कछुवा कुछ भी करने के लिए असमर्थ था। इसलिए, वह शिकारी के हाथों पकड़ा गया।

शिकारी ने उसे अपने थैली में डालकर वह से निकल गया। अब सभी जानवर चिंता में पड़ गए, और सोचने लगे कि इस विपदा से अपने मित्र कछुवे को कैसे बहार निकले। सब ने मिलकर कछुवे की जान बचाने कि तरकीब निकली।

वह शिकारी नदी के किनारे पहुँचा जहाँ उसने कछुवे को पकड़ी थैली निचे रखी। और हाथ- पैर धोने के लिए नदी के पास गया। सभी के योजना अनुसार हिरन शिकारी से कुछ दुरी पर जमीन पर लेटे मरने का नाटक करने लगा। उसी वक्त हिरन के ऊपर कौवा आया जो हिरन को चोंच मारने लगा।

कौवा हिरन को चोंच मारते देख शिकारी को लगा, हिरन अभी-अभी मरा लगता है। यानि उसका माँस अभी ताज़ा ही होना चाहिए।

यह सोचकर वह शिकारी हिरन को उठाने हेतु उसके पास जाने लगा। तभी बिल से चूहा बाहर आया और कछुवे को रखे थैली को काट दिया। तब वहाँ से तुरंत निकलकर कछुवा नदी में कूदा और नदी की गहराइयों में गायब हो गया।

जाल काटने के तुरंत बाद चूहा फिर से अपने बिल में चला गया। दूसरी और हिरन के नजदीक जाते ही, कौवा वहाँ से उड़ गया। हिरन भी झट से उठकर तेज़ी वहाँ से दूर भाग गया और जंगलो कि गहराइयों में लुप्त हो गया।

इस प्रकार सभी जानवरों ने मिलकर अपनी जान जोखिम में डालकर बड़ी चतुराई से अपने साथी कछुवे कि जान बचाई। अगले दिन फिर से सभी जानवर अपने आगे कि यात्रा करने निकल पड़े।

सिख: बड़ी से बड़ी कठिनाई को भी एकता की ताकद से दूर किया जा सकता है। इसलिए, सभी को एक दूसरों कि कमियों को भूलकर, एकता से मिलजुलकर रहना चाहिए।

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भोला सखाराम:

सैंकड़ो साल पहले की बात है, एक रसौली नाम का एक छोटा गाँव था। उस समय खेती करना इंसान को ज्ञात नहीं था। खेती ना होने की वजह से गांव में गाय-भैस, भेड़- बकरी चराने का काम लोग करते थे। उनसे जो दूध, दही, कंडे, गोबर निकालता था उसी से वह लोग अपना गुजरा करते। चलन में सिक्कों के साथ उस का भी जरूरत पड़ने पर लोग आदान-प्रदान करते थे।

उसी गाँव में सखाराम नाम का आदमी भी रहता था। सखाराम के पास बहुत सारी बकरियाँ थी, जिन्हे चराने वो हर दिन जंगल में जाता था। दिनभर बकरियाँ चराकर शाम के समय सखाराम वापस लौटता था। बकरियाँ भी दिनभर घास, और हरे-भरे पत्ते खाकर मजे से उछलते-कूदते हुए वापस घर लौटती थी।

जंगल में पेड़ से ज्यादा घास थी, इसलिए धुप सीधे माथे पर आती थी। एक दिन, बकरियों का चराते- चराते सखाराम जंगल में बहुत अंदर तक चला गया।

तब जेष्ठ का महीना था, और सूर्य की किरणें आग की तरह महसूस हो रही थी। जमीन तपकर सभी जीवों को गर्मी का अहसास करा रही थी। गर्मियों के दिनों में दिखने वाली आंधीयाँ भी ज़मीन के धूल को लेकर हवा के झोंके के साथ आसमान में उड़ रही थी।

ऐसे कोयले कि अंगारों जैसे ज़मीन पर चलकर सखाराम आगे बढ़ रहा था। सखाराम बहुत देर तक कड़ी धुप में चल रहा था। अब उसे प्यास लग रही थी, लेकिन उसके आसपास कोई भी पानी का स्त्रोत नहीं था। सखाराम अब पेड़ के निचे गिर गया, और पानी के लिए तड़पता रहा। सारी बकरियाँ उसके नज़दीक घास चर रही थी।

तभी एक गजब हो गया साक्षात भगवान शिव वहाँ पधारे और उन्होंने सखाराम को देखा जो प्यास से तड़फ रहा था। तब भगवान शिव ने एक तपस्वी का वेश धारण करके एक हाथ में जल से भरा कमंडल लेकर उसके पास गए। तब सखाराम लगभग आखिरी साँसे गिन रहा था। भगवान शिव को सखाराम पर दया आयी, उन्होंने सखाराम को पानी पिलाकर मानो एक नया जीवन प्रदान किया। उसके बाद उन्होंने उसे खाने के लिए फल दिए। सखाराम ने आधे फल को खाकर आधा अपनी पोटली में रख दिया। जिसके कारन सखाराम कुछ बोल सके इस स्तिती में आ गया।

तपस्वी ने पूछा क्या बात है तुम इतने धुप में इस सुनसान जंगल में क्या कर रहे हो। तब सखाराम बोला की में रोजे इस जंगल में बकरियाँ चराने आता हुँ। लेकिन आज गलती से बहुत अंदर तक चला गया था, जिसकी वजह से बहार आने तक बहुत देर हो गयी, और बिचमेंही प्यास लग गयी जिस के कारण मुझे बीच में ही रुकना पड़ा।

कुछ की देर में शाम हो गयी इसलिए उस तपस्वी से विदा लेकर बकरी यों के साथ वापस घर लौटा। घर लौटने के बाद अपनी पत्नी मंजिला को उसने बचा फल दे दिया। जो मंजिला ने रसोई घर में पाट पर रख दिया।

रात में खाना खाने के बाद वह लोग सो गए , सुबह अगले दिन मुर्गे की बांग के साथ उसका नींद खुल गया । हाथ मुंह धो कर सुखराम रसोईघर में गया और पाट में रखे हुए फल को देखा ।

रात को दोनों साथ में खाना खाने के बाद सो गए। हर दिन के तरह प्रातः के समय मुर्गे कि बांग के साथ सखाराम ने अपनी दिनचर्या शुरू की। उसने स्नान कर रसोई घर में गया, तब सखाराम के मानो होश ही उड़ गए। सखाराम को कल साधु द्वारा दिया फल जो उसने पाट पर रखा था अब सोने का बन गया था।

अब वह फल चुपचाप बिना किसी को बताये फल को कपडे में छिपकर बकरियाँ चराने के बहाने जंगल चला गया। आज मन ही मन सखाराम बहुत खुश था, उस पुरे दिन वह सोचता रहा कि वह उसका क्या करेगा। शाम को वापस आने के बाद पत्नी ने बनाया खाना खाके वह सोने के लिए गया। लेकिन हैरत कि बात ये थी की वह पूरी रात सो नहीं पाया।

दूसरे ही दिन प्रातः जल्दी उठकर वह पत्नी को कुछ काम के सिलसिले में जा रहा हूँ कहकर वह शहर की और निकल पड़ा। और जाते-जाते पत्नी से कहा की, “अगर हो सके तो आज तुम बकरियाँ चराने चली जाना”। मंजिला सुबह- सुबह घर का सारा काम निपटने के बाद बकरियों को चराने जंगल कि और चल पड़ी।

इधर सखाराम जो सोने को पाकर बहुत खुश था, शहर पहुँचते ही पहले वह सोनार के यहाँ गया। सखाराम ने फल उस सोनार के हाथ में दे दिया। सोनार ने उस चमत्कारी फल को देख उसके भी मन में लालच आ गया। सोनार बोला भाई इस क्या तोलना इसे देखकर में बता सकता हूँ, की इसका वजन क्या होगा। लेकिन सखाराम नहीं माना और वजन करके ही उसके पैसे देने पर डटा रहा।

इसलिए आखिरकार सोनार ने तराजू निकालकर उस सोने के फल का वजन करने लगा। वजन करके पैसों की गड्डी सोनार ने सखाराम के हाथ थमा दी। सखाराम मानो इतनी बड़ी नोटों की गड्डी देखकर बावरा सा हो गया।

सखाराम ने बिना मोल-भाव पूछे पैसे लेकर वहाँ से निकल पड़ा। जाते- जाते सोनार ने सखाराम से कहाँ कि अगर जरुरत पड़े तो फिर से इधर ही आना में तुम्हें बहुत अच्छा भाव दूँगा। सोनार सखाराम से बहुत काम दाम में सोना खरीदने के वजह से बहुत खुश था।

सखाराम शाम तक वापस अपने गाँव आ पहुँचा, तब तक उसकी पत्नी जंगल से वापस लौट चुकी थी। सखाराम ने अपनी पत्नी मंजिला को साथ में बिठाया और उसको सारी बात खुल के बताई। सखाराम ने सोने के फल के बदले मिली पैसों की गड्डी मंजिला के हाथ में रखी। इतने पैसे एकसाथ देखकर मंजिला के होश उड़ गए।

उस पैसो से सखाराम और मंजिला ने नए कपडे, बर्तन, घर में नयी वस्तुएँ, महंगे अलंकार ख़रीदे। दोनों ने एक सुन्दर सा घर भी बनवाया साथ में उन्होंने कई सारी बकरियाँ भी खरीदी। सखाराम की दरिद्रता नहीं रही, अब वह धन वान सखाराम बन गया था। बहुत धन वान होने के कारण पुरे गाँव में अब उसी की चर्चा होने लगी। सब लोग चकित थे यह देखकर की, ये लोग इतने कम दिनों में इतने ज्यादा धन वान कैसे बन गए।

सखाराम और उसकी पत्नी बहुत भोले इन्सान थे, लोगों के पूछने पर उन्होंने पूरी सच्चाई गाँववालों को बता दी। लोगों का विश्वास न होने पर उन्होंने उस फल को लोगों को दिखाया। कुछ दिन बाद कुछ लोग अचानक से उनके घर आ गए, उन्होने सखाराम से पूँछा, हमने आपके अमीर होने के बारे में जो कुछ सुना है, क्या वह वास्तव में सच है?

हम भी उस सोने के फल को देखना चाहते। सखाराम ने अपने भोलेपन के चलते पूरी बात फल को दिखाते हुए बता दी। वह लोग फल देखने के बाद वह लोग वापस चले गए। उस रात सखाराम के घर उसी सोने के फल की चोरी हुई, लेकिन चोरों की फिसफिसाहट की आवाज से सखाराम की नींद खुल गयी।

सखाराम ने उन चोरों के चेहरे को देख लिया था। और पहचान लिया की यह तो वही व्यक्ति है जो सुबह फल के बारे में पूछ रहा था। सखाराम के घर चोरी होने की बात आग की तरह पुरे गाँव में फ़ैल गई।

सखाराम उस पूरी रात चोरी की वजह से सो नहीं पाया। सुबह-सुबह वह पंचायत पहुंचकर चोरी की बात पंच को बताई। पंच के बुलाने पर वह चारों व्यक्ती पंचायत में हाजिर हो गए। पंचों ने सवाल किया की क्या तुम चारों ने सखाराम का सोने का फल चुराया।

सीधे-सीधे वह चारों लोग चोरी करने की बात स्वीकार नहीं कर रहे थे। इसलिए पंच ने उन्हें थोड़ा धमकाया जिसके कारन चारों ने चोरी करने की बात को कबूल की। चारों में से एक ने जहॉं फल छुपाया था वहाँ जाकर वह फल वापस लाया।

पंच ने थैली खोलकर देखा तो पाया की उसमे तो कच्चे फल है। चोरों को चोरी की वजह से गाँव से निष्काषित कर दिया गया। लेकिन अब सखाराम और मंजिला वह फल सोने का नहीं था इसके वजह से निराश हुए।

सिख: कोई व्यक्ति अगर जरुरत से ज्यादा भोला हो, तो ऐसे व्यक्ति का लाभ उठाने में दुनिया कोई कसर नहीं छोड़ती। इसलिए, जिस इंसान की नियत सही नहीं हो, ऐसे इंसान के साथ सच बोलना जरूरी नहीं होता।

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सेठ जी की चतुराई:

आज में आपको एक प्रेरणादायक कथा सुनाने जा रहा हूँ। जिसका शीर्षक है, सेठ जी की चतुराई।

मानपुर नाम का एक बड़ा शहर था। जिस शहर में शंकर सेठ नाम का एक बड़ा व्यापारी रहता था। उसके बड़े दुकान में ग्राहकों की कतार लगी रहती थी। काम का भार बढ़ने पर शंकर सेठ ने काम पर नौकरों को रखने का सोचा। इसलिए उसने दो नौकर दुकान में काम के लिए रखे।

नौकर हर रोज सुबह दुकान पर काम के लिए आते और रात को वापस चले जाते। दोनों नौकरों को शंकरसेठ बराबर तनख़्वाह देते। कुछ दिनों पश्चात शंकरसेठ को लगा की दुकान में से कुछ सामान और चीजें तेज़ी से गायब हो रही है। तो दूसरी और गायब हुई चीजों के मुकाबले गल्ले में पैसा नहीं बढ़ रहा था।

शंकर सेठ अब चिंता में पड़ गए, रात को घर आने के पश्चात उन्होंने सारी बात अपनी पत्नी को बताई। तब शंकर सेठ को पता चला की पत्नी को भी पिछले कुछ दिनों से ठीक ऐसा ही लग रहा था। क्योंकि घर की चीजें भी तेज़ी से कम हो रही थी। इसलिए उन्होंने इस परेशानी के जड़ तक जाने का फैसला किया।

उसके लिए सेठ के साथ सेठानी भी हर एक नौकर के घर गए। दोनों के घर छानबीन करने पर उनको पता चला की उनके दुकान का कुछ सामान एक नौकर के घर पर है। घर आने के बाद सेठानी ने उस नौकर हो काम से निकल देने की सलाह दी।

लेकिन शंकर सेठ को उसके परिवार को देखके यह सवाल मन में आया, “अगर में उस नौकर को काम से निकलूंगा, तो उसके परिवार का क्या होगा?” वैसे भी काम से निकालने पर वह नौकर जहाँ जायेगा वहाँ चोरी करेगा। इसलिए शंकर सेठ ने उनके अच्छे स्वभाव के चलते, उस नौकर को काम से निकालने की वजह उसे सही रास्ते पर लाने की ठान ली।

अब शंकर सेठ दूसरे दिन से दोनों नौकरों की मजदूरी बढ़ाने का निर्णय लिया। दोनों नौकरों के परिवारवालों के लिए सेठ जी ने नए कपड़ों के साथ पदत्राणे लेकर दी।

इतना खर्च करने पर सेठानी सेठ जी पर बड़ा गुस्सा हुई। सेठानी बोली, “आपने कहा था की उस चोर को सही रास्ते पर ले आएँगे। यहाँ आप तो उस चोर के घर भर रहे हो, आपको तो व्यवहार ज्ञान नहीं है, पता नहीं आप इतने बड़े व्यापारी कैसे बन बैठे।”

सेठ जी बोले, “देखो मैंने जो भी किया वह उन नौकरों के साथ-साथ अपने भी भले के लिए किया। क्योंकि कोई भी इंसान काम करके चोरी करना तभी प्रारंभ करता। जब उसे उचित आमदनी ना मिलती हो। वैसे भी अगर उनके घर अगर तंगी होगी तो वे दुकान में ठीक से काम नहीं कर पाएंगे।” सेठ जी ने जो किया उस पर पूर्ण विश्वास था।

उसके कुछ दिनों पश्चात उन्हें पता चला की दुकान में से सामान गायब का होना पूरी तरह से बंद हो गया है। दोनों नौकर सेठ जी ने आमदनी बढ़ाने की वजह से ख़ुशी से और मन लगाकर काम करने लगे। काम अच्छे से करने के कारन सेठ जी की आमदनी अपने आप बढ़ गयी।

अगर उस समय शंकर सेठ ने खुदगर्जी दिखते हुए नौकर को निकाल दिया होता तो, वह नौकर कभी सुधरता ही नहीं। सेठ जी के दूरदृष्टि सोच और प्रौढ़ आचरण से सभी का जीवन सुखमय हो गया।

सिख: अपराधी को अगर उसका अपराध बहुत बड़ा ना हो तो प्रेम से भी समझाया जा सकता है।

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सुख कि खोज:

बहुत पहले की बात है, हिंदुस्तान में थंपी नाम का एक बहुत बड़ा नगर था। उस राज्य के राजा महाराज राजेंद्र नाथ हर सुख सुविधा से संपन्न थे। उनके राज महल में सैंकड़ो नोकर दिन-रात काम करते थे। उनका राज्य चारो तरफ से प्राकृतिक दृष्टि से संरक्षित था। महाराज राजेंद्र नाथ के पास सारी भोगविलास कि सभी वस्तुएँ मौजूद थी। तो दूसरी ओर राज्य भौगोलिक दृष्टि से यानी क़ुदरती रूप से सुरक्षित होने के कारण राज्य के सुरक्षा कि भी चिंता नहीं थी। सुख सुविधाओं से परिपूर्ण और चिंता मुक्त होने के बावजूद भी महाराज राजेंद्र नाथ हमेशा दुखी और हताश रहते।

खुद को खुश रखने हेतू एक दिन महाराज राज्य जे बाहर घूमने के लिए गए। दूर हिमालय कि चोटियों में भ्रमण करते समय उनको एक तपस्वी साधू के दर्शन हुए। महाराज राजेंद्र नाथ ने उस तपस्वी को झुक कर प्रणाम किया। महाराज ने तपस्वी से कहा, “स्वामी में जिस राज्य में राज कर रहा हूँ। वहाँ मेरे पास हर सुख-सुविधा है। राज्य भी दुश्मनों से पूरी तरह सुरक्षित है। मुझ पर किसी प्रकार का तनाव भी नहीं रहता। इसके बावजूद भी में हमेशा निराश और दुखी रहता हूँ। इसलिए, मुझे कुछ ऐसा उपाय बताए जिसके बाद में सुखी और संपन्न जीवनव्यापन कर सकूँ।”

तपस्वी ने राजा कि बात सुनने के बाद बोले, “वत्स! तुम्हारी परेशानी का बहुत सरल उपाय है। जाओ और किसी सुखी व्यक्ति के पदत्राण एक दिन के लिए पहनो। ऐसा करने से तुम्हारे सारे दुःख दूर होकर तुम सुखी जीवन जी सकोगे।”

यह उपाय बताने के बाद महाराज वहा से विदा लेते है। वह अपने राज्य वापस लौटने पर अपने सेवक, फौज, जासूस सभी को सुखी व्यक्ति को ढूंढ़कर उसके पदत्राण लाने को कहा। राजा ने अपनी अपनी सारी शक्ति लगा ली। खोज अभियान में दो साल बीत गए लेकिन महाराज राजेंद्र नाथ को पूरे विश्व में ऐसा कोई भी इंसान नहीं मिला जो सुखी हो।

राजा के सैनिकों ने हर गाँव-नगरों में से हर घर में जाकर देखा। लेकिन हर कोई अपने दुःख कि कथा सुनाता।

तब उनके सैनिकों, सेवकों, जासूसों से पता चला की हर कोई किसी ना किसी परेशानी से जुंज रहा था। कोई मज़दूर दरिद्रता के कारण, भिकारी भूख से, धनवान निपुत्रिक होने से, कोई व्यक्ति असाक्षर होने से, कोई व्यक्ति अपनी पत्नी के व्यवहार से, तो कोई अपने पुत्र के व्यवहार से दुखी था।

फिर महाराज राजेंद्र नाथ वापस उस साधू से मिलने हिमालय में जाते है। तपस्वी से मिलने पर महाराज बोले, “स्वामी मैंने लगभग हर राज्य में अपने सैनिकों, दूतों, और जासूसों द्वारा सुखी इंसान कि खोज की। लेकिन मुझे ऐसा सुखी इंसान कही पर भी नहीं मिला। आप तो अंतर्यामी है, अब आप ही बताए ऐसा मनुष्य कहा मिलेगा। और मुझे सुख कि प्राप्ती में सहयोग करें।”

तब तपस्वी बोले, “वत्स! यही तो जीवन है। जीवन है तो दुःख भी है। इसलिए, इस धरती पर एक भी मनुष्य ऐसा नहीं जो पूरी तरह से सुखी हो। इस बात को ध्यान में रखते हुए हर इंसान को सादा जीवन जीना चाहिए। सामान्य जीवन जीने से मनुष्य जरूरते कम होती है, जिससे अपने आप ही बहुत सारे दुख कम होते है।”

तपस्वी ने आगे कहा, “देखो वत्स! तुम एक राजा हो। इसलिए, पूरी तरह सामान्य जीवन जीना तुम्हारे लिए संभव नहीं। फिर भी जितना हो सके अपने आप कि जरूरते कम करके देखो। अपनी प्रजा समय-समय पर हालचाल देखो और उन्हें सुखी करने प्रयास करो। तब तुम्हारे दुःख अपने आप कम होंगे। इसतरह से तुम जिस सुखी जीवन कि कामना कर रहे हो वो सुखी जीवन तुम जी सकोगे।”

साधू कि बात मानते हुए महाराज राजेंद्र नाथ महल लौटते ही अपनी जरूरते कम करते है। अब महाराज खाना भी जितना आवश्यक था उतना ही लेते, राज महल में जितने सेवकों कि जरुरत थी उतने ही रखे, और बाकियों को प्रजा के हित में कार्य करने भेजा। महाराज ने अब से प्रजा का हाल देखने के लिए हर रात को अपने राज्य में घूमना शुरू किया। प्रजा को न्याय मिले इसलिए दरबार में लोगों मामले सुलझाने में समय अधिक देने लगे। अब महाराज राजेंद्र नाथ को पता चला व्यक्ति को सुख बहुत सारा धन कमाके, सुविधावों से संपन्न महलों में रहकर नहीं मिलता बल्कि प्रजा दुःख कम करके उन्हें सुविधा संपन्न करके मिलता है।

सिख: दूसरों का दुःख बाँटकर और दुःखी लोगों को खुश करके कोई भी व्यक्ति सुख को अर्जित कर सकता है।

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जिम्मेदार इंसान:

पुराने ज़माने कि बात है जब हिंदुस्तान में कई सारे छोटे राज्य बन गए। ऐसा ही एक राज्य सूरज नगर राज्य में शरद कुमार नाम का राजा राज करता था। वह अपने राज्य को सुचारु रूप से चलाने के लिए अपने राज्य में नए-नए प्रयोग करता था।

एक दिन उसने अपने राज्य के लोग ज़िम्मेदार है या नहीं यह देखने के लिए एक प्रयोग किया। राजा शरद कुमार खुद भेस बदलकर राज्य के एक सड़क पर गया। उसने सड़क के बिचोबिच एक बड़ा पत्थर रखा और उसके नीचे दस मुहरों से भरी थैली रखी जिसके साथ एक चिट्ठी रखी जिसमे लिखा था, “ये दस मुहरें राज्य के जिम्मेदार व्यक्ति को इनाम के तौरपर!”

अब राजा शरद कुमार रास्ते के पासवाले झाड़ी में छुप कर देखने लगा कि कौनसा कर्तव्यपरायण व्यक्ति उस पत्थर को उठाकर अपनी ज़िम्मेदारी पूरी करता है। थोड़ी देर में एक दूधवाला अपने ही धुन में रास्ते से चलकर आया। उसने वह बड़ा पत्थर नहीं देखा और चलते-चलते उस बड़े पत्थर से ठोकर खाके गिर गया। सारा दूध रास्ते पर गिर कर बर्बाद हो गया। उसे उस पत्थर पे बहुत गुस्सा आया और उसने पत्थर कि ओर गालिया देते हुए आगे निकल गया। राजा कि कसौटी पर दूधवाला तो विफल हो गया।

थोड़ी देर बाद घोड़ों के टापों कि आवाज़ आने लगी। टांगे में बैठकर लगभग चार लोग आ रहे थे। टांगा चलाने वाला उस पत्थर को देख नहीं पाया। जिसके वजह से गाड़ी का एक पहिया पत्थर पर टकराया। टांगा गाड़ी बहुत जोर से टकराने से सारे यात्री नीचे गिरते-गिरते बच गए।

टांगा चालक बोला, “पता नहीं यह इतना बड़ा पत्थर रास्ते के बिचोबिच किसने डाला होगा”

लेकिन उसने भी सामाजिक कर्त्तव्य समझकर वह पत्थर उठाना सही नहीं समझा।

कुछ देर और गुजरने पर वहा एक महिला पानी के मटके सिर पर रखके ले जा रही थी। उसका पूरा ध्यान मटकों पर था इसलिए उसने नीचे देखा नहीं और वह भी जोर से गिर गयी।

तब वह जोर से चिल्लायी, “हे माँ! पता नहीं इतना बड़ा पत्थर बीच में कैसे आया!”

उसका घड़ा भी टूट गया इसलिए वह औरत भी पत्थर को वहाँ से हटाने के वजह दुखी होकर आगे निकल गयी।

कुछ देर बाद वहाँ एक मज़दूर आया उसके हाथ में एक थैली थी। वह बहुत थककर आया था इसलिए घर जाने जल्दी में वह उस बड़े पत्थर को देख नहीं पाया। उसका पैर भी जोर से उस पत्थर पर टकराया और वो भी जोर से नीचे गिर गया। बहुत पहले से थककर आने से उसने भी पत्थर को हटाने के बारे में नहीं सोचा।

राजा शरद कुमार ने दो दिनों तक देखा कई सारे लोग उस पत्थर कि वजह से जोर से गिर रहे है। राजा शरद कुमार को लगा था कि कोई ना कोई तो पत्थर को उठा ही देगा। लेकिन एक भी व्यक्ति ने उस पत्थर को वहाँ से हटाने के बारे में नहीं सोचा था।

दो दिन तक निरीक्षण किया लेकिन ऐसा व्यक्ति जो ज़िम्मेदारी से पत्थर हटाए। और दूसरे आनेवाले लोगों के बारे सोचे ऐसा एक भी इंसान उसको मिला नहीं।

अब राजा उदास मन से वापस राज महल लौटा। अब राजा शरद कुमार को पता चल गया कि, राज्य में अगर कर्तव्यपरायण लोगों का गठन करना हो तो सुचारु रूप से चलने वाली न्याय व्यवस्था, दंड विधान होना ही चाहिए। उस राजा ने उन चीजों पर ज्यादा ध्यान दिया, जिसके वजह से लोगों को धीरे-धीरे राज्य जे प्रति ज़िम्मेदारी का अहसास होने लगा।

सिख: हम सभी को अपने देश के प्रति कर्तव्यपरायण रहना चाहिए।

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जंगल कि देवता:

बहुत समय पहले कि बात है, चंपी नाम का राज्य था वहाँ का महाराज गुप्तसेन बहुत गुस्सैल राजा था। उसके दरबार में अत्यंत गुनी विद्वान और सरदार थे। एक दिन महाराज अपने राज्य के सुरक्षा कि जाँच करने के लिए राज्य के शस्त्रागार कक्ष में जाकर शास्त्रों कि निगरानी करते है। निगरानी करते समय गलती से एक शस्त्र से उनके दाहिने हाथ का अंगूठा घायल हुआ।

महाराज के अंगूठे को चोट आने से सभी दरबारी एक-एक कर उनसे मिलने आए। उन दरबारियों में एक प्रधान थे जो बहुत ही बुद्धिमान व्यक्ति थे।

वह महाराज से मिले और कहा, “महाराज आप जराभी चिंता ना करे, क्योंकि जो भी होता है अच्छे के लिए ही होता है।”

महाराज ने अपने दरबार के एक महत्वपूर्ण व्यक्ति से सहानुभूतिपूर्ण बातों कि अपेक्षा की थी। ऐसा असंवेदनशील जवाब सुनकर महाराज को बहुत गुस्सा आया। महाराज ने तुरंत सैनिकों को बुलाकर प्रधान को बंदी बनाने का आदेश दिया। प्रधान ने महाराज गुप्तसेन को बहुत समझाने कि कोशिश की लेकिन महाराज नहीं माने। फिर महाराज ने दूसरे ही दिन नए प्रधान की नियुक्ति की। दरबार के बाद महाराज को शिकार पर जाने कि इच्छा हुई।

जंगल में जाने पर उन्हें एक खरगोश दिखा। महाराज ने निशाना साधा लेकिन, ख़रगोश छलांग मारने से बच निकला। महाराज गुप्तसेन ख़रगोश का पीछा करते समय भूल गया कि वो कितने ज्यादा अंदर आया है।

उसी जंगल में कुछ आदिवासी लोग रहते थे। जो उनके जाल में फँसे व्यक्ति की बली देते थे। उन आदिवासियों कि ऐसी श्रद्धा थी कि हर साल एक बलि देने से उन्हें जंगलों से अच्छी उपज होती है।

उन आदिवासियों के बिछाये जाल में महाराज गुप्तसेन फँस गए। अब महाराज को उन आदिवासियों ने बंदी बनाकर अपने आद्य जंगल देवता कि गुफा में ले गए। जहाँ अब महाराज कि बलि चढाई जानेवाली थी।

बलि चढाने से पहले उनका ऐसा मानना था कि, बलि चढाने के लिए लाये व्यक्ति को किसी भी प्रकार की ख़रोश तक नहीं होनी चाहिए। ऐसा व्यक्ति को जंगल देवता स्वीकार नहीं करती। ऐसा करने पर जंगल देवता कुपित होती है।

गुफ़ा के अंदर कोने में कुटियाँ थी जहाँ स्त्री आदिवासी का आना वर्जित था। बलि चढ़ाने से पहले एक आदिवासी ने उस कुटिया में जाकर महाराज का निरीक्षण किया। तो उसका हाथ देखते ही आदिवासी को पता चला कि इस व्यक्ति के हाथ पर तो गहरा घाव है। यानि यह व्यक्ति बलि देने के लायक नहीं है। इसलिए, आदिवासियों ने महाराज के आँखों पर पट्टी बाँधी और जहाँ से लाया था, वापस उसी स्थान पर छोड़ दिया।

महाराज वहाँ से रास्ता खोजके कुछ दिनों बाद अपने राज महल वापस पहुँचते है। वापस लौटने पर महाराज ने पूर्व प्रधान को सजा से मुक्त किया।

प्रधान केराज दरबार में आने पर महाराज गुप्तसेन ने सारी कथा सभी राजदरबारिओं को सुनाई। फिर महाराज ने उसे वापस सन्मान के साथ वापस प्रधान बनाया।

आखिर में महाराज बड़े ख़ुशी के साथ हँसकर बोले, “जो भी होता है, अच्छे के लिए होता है।”

सिख: सुख और दुःख दोनों जीवन का हिस्सा है। इसलिए, दुःख के आने से निराश ना हो। ईश्वर पर आस्ता रखे, क्योकि कभी-कभी यही घटनाये हम पर आनेवाले बड़े संकट से हमें बचाती है।

पढ़िए घोड़े और गधे कि कहानी

बुरी आदत:

लगभग साढ़े तीन सौ साल पहले हिंदुस्तान में एक संत थे। जो अपने विचारों को सभी लोगों तक पहुँचाने के लिए एक गाँव से दूसरे गाँव भ्रमण करते थे। वह संत बहुत ही सादा जीवन जीते थे। उनके वाणी से उनके विचारों का तेज़ हर व्यक्ति को परिवर्तित करने की क्षमता रखता था। उन्हें आध्यात्मिक जीवन के साथ सांसारिक चीजों का भी ज्ञान था। वो जहाँ भी वहाँ के लोगों को अपने सदाचारी विचारों से प्रभावित करते। उनके सिख से बहुत सारे लोग बुरे काम छोड़कर अच्छाई कि राह पर चलने लगे थे।

एक दिन वो संत एक गाँव के मंदिर में साधना कर रहे थे। तब वहाँ मंदिर लूटने के लिए एक डाकू आया तब, मंदिर में पुजारी के साथ-साथ जितने भी लोग थे सब भाग गए। लेकिन वह संत अभी भी साधना में लीन थे।

डाकू ने उस संत के पास जाकर हँसते हुए पूछा, “शायद तुम्हें अपनी जान प्यारी नहीं है।”

तब संत ने अपनी आँखे खोली और कहा, “जान का क्या वो तो कभी न कभी तो जानी ही है। किसी कि जान का जाना बदला नहीं जा सकता लेकिन, तुम जो लूटमार करके अपना गुजरा करते हो, वो बदला जा सकता है।”

संत ने और बहुत कुछ सुनाकर उस डाकू को अपना अनुयायी बना लिया। डाकूने लूटमार छोड़के अच्छाई कि राह पर चलने का वचन संत को दिया। सदाचार कि बातें सुनकर वह डाकू वापस अपने घर चला गया जो जंगल में था।

दूसरे दिन वह डाकू फिर से लूटमार करने लगा। एक दिन वह जिस गाँव में रहता था उसी गांव में वह संत आए थे जिन्होंने पहले उसको उपदेश दिया था।

डाकू फिर से उस संत के पास गया तब संत ने पूछा, “क्या हुआ? क्या तुमने फिर से लूटमार करना आरंभ किया।”

डाकू बोला, “स्वामी, आपके विचार अभी भी मेरे मन में है और मैंने आपके बताए मुताबिक आचरण करने भी कि कोशिश कि लेकिन लूटमार करना मेरा स्वभाव बन गया है।”

संत बोले, “क्या तुम्हें लूटमार करना पूरी तरह से छोड़ना है?”

डाकू बोला, “हाँ स्वामी!”

तब संत ने कहा, “अगर तुम लूटमार छोड़ना चाहते हो तो, तुम कल से लूटमार करने के लिए पूरी तरह से मुक्त हो लेकिन, तुम दिनभर में जो भी कुकर्म करोगे वह रात को मंदिर में आकर मुझे बताओगे।”

डाकूने कहा, “हाँ-हाँ स्वामी! आपका उपाय तो बहुत बढ़िया है। में जरूर आपको बताऊँगा।”

फिर डाकू संत का आशीर्वाद लेकर वहाँ से चला गया।

इसके बाद दिन बिताते गए लेकिन वह डाकू फिर मंदिर में नहीं आया। तब उस संत के एक शिष्य ने उनसे पूछा, “गुरूजी आपने बताए मुताबिक डाकू ने रोज रात को उसने दिन में जो कुछ किया वो बताने का वचन दिया था। लेकिन उसने आपको दिया वचन तोड़ दिया।”

तब संत बोले, “नहीं वत्स! डाकूने वचन नहीं तोडा बल्कि उसने जो अच्छाई के मार्ग पर चलने का वचन उसने पूर्ण किया है।”

शिष्य ने पूछा, “लेकिन स्वामी वो कैसे?”

संत बोले, “कोई भी व्यक्ति सबसे छुपकर अपराध कर सकता है लेकिन, उस व्यक्ति को उसने किया गुनाह अगर कबूल करना हो, तो वह व्यक्ति कभी गुनाह करेगा ही नहीं।”

शिष्य को संत कि बातों पर तब विश्वास तो नहीं हुआ लेकिन, अपने गुरु होने के नाते वह कुछ बोला नहीं। कुछ ही दिनों में उन्हें उस डाकू कि खबर मिली की वह उसने अब लूटमार बंद की है। अब वही डाकू लकड़ी तोड़कर अपना गुजरा करता था।

सिख: अपनी ग़लतियों को किसी नज़दीकी व्यक्ति साथ साझा करने से भविष्य में ऐसी ग़लतियाँ करने से आप बच सकते है।

पढ़िए शेर और लकड़बग्घे कि कहानी

चंचल मन:

इस कहानी में एक महात्मा द्वारा खजूर खाने का लालच त्याग मन पर सय्यम बनानेवाला मनुष्य ही जीवन में अच्छी सफलता प्राप्त कर सकता है| यदि मन पर सय्यम ना रहे तो मनुष्य का जीवन पर से अंकुश हटकर गुलामी का जीवन व्यतीत करना पड सकता है। इस कहानी से हमें एक महात्मा कैसे अपने मन को समझते हुए आनेवाली विपदा से बचते है, आइये देखते है।

एक बड़े महात्मा बाजार के रस्ते से गुजर रहे थे। तभी उन्होंने सामने खजूर की दुकान देखी, जो महात्मा जी को बचपन में प्रिय थी| तब महात्मा के मन में विचार आया खजूर लेनी चाहिए। तब महात्मा ने मन को खूब समझया और वह से आगे बढे। खजूर खाने की छह ने उसे पूरी रात सोने नहीं दिया। दूसरे दिन विवशता के कारण महात्मा जंगल के और निकल पड़े। खजूर खरीदने के लिए धन एकत्रिक करने के उद्देश्य से महात्मा जितना हो सके उतना लकड़ी का गट्ठर उठाया।

महात्मा ने अपने मन को समझाते हुए कहा, यदि तुम्हे खजूर खाने है तो यह बोझ तो उठाना ही होगा। महात्मा वह भारी भरकम बोझ उठाकर थोड़ी दूर जाने के बाद गिर जाता। भारी बोझ के कारण उसका चलना दुष्कर हो गया था। लेकिन वो फिर भी बार-बार उठकर चलता और गिर जाता। उसके पास एक छोटासा गट्ठर उठाने की ताकत नहीं थी, लेकिन इस बार उसने दो-दो भारी गट्ठर उठाये थे। तीन-चार मील चलने के बाद महात्मा शहर पहुंचा| उसने सारी लकड़ियों को बेचकर जो पैसे मिले उससे खजूर खरीदने जंगल चल पड़ा।

खजूर को देख महात्मा खूब प्रसन्ना हुआ। उसने खजूर खरीदे लेकिन, अपने मन से कहा, की आज तूने खजूर मांगे है, कल कुछ और मांगेगा। कल शाही वस्त्र और परसो स्त्री की इच्छा होगी। फिर बाल-बच्चे भी होंगे। उसके बाद तो में पूरी तरह तेरा गुलाम ही बन जाऊंगा। सामने से एक यात्री आ रहा था। तब महात्मा ने उसे रोककर खरीदे हुए सारे खजूर उसे मुसाफिर को दे दिए। इस तरह महात्मा ने खुद के मन को समझते हुए अपने मन को गुलाम बनाने से रोक लिया।

सिख: यदि मन का कहना नहीं मानोगे तो, मन को काबू कर सकोगे और जीवन में सफलता पाओगे। यदि मन का कहना मानोगे, तो मन का गुलाम बन जाओगे और हात में बरबादी के सिवा कुछ नहीं आएगा।

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