18 Moral Stories In Hindi For Kids To Inspire

So, you are looking for ultimate moral stories that will actually add some value to your life. So, here we are sharing our awesome collection of moral stories.

हेलो दोस्तों! आज में हूँ आपका दोस्त आशीष और आज में शुरू करने जा रहा हूँ, एक नयी सीरिज़, इस के दौरान में, में आपको हर रोज एक नयी कहानी बताऊंगा। हर कहानी के आखिर में आप को उस कहानी से कुछ सिख मिलनेवाली है यानि आप कुछ नया सीखनेवाले है। तो उम्मीद करता हूँ की आप सभी लोग इस नयी सीरिज़ से खुश होंगे।

मुझे पता है कि बहुत सारे लोग समझते होंगे की कहानियाँ तो बच्चे पढ़ते है, हम तो बड़े हो गए है। हमें इन कहानियों से क्या लाभ होगा।

इसीलिए आजकी पहली कहानी बताने से पहले में आपको नैतिक कहानियाँ, या बोध कथाये पढ़ने या सुनने के फ़ायदों के बारे में बताना चाहता हूँ। पहला लाभ तो यह हो सकता है की आपको ऐसी कहानियाँ अपने जीवन में सकारात्मक सोच रखने के लिए प्रोत्साहित करेंगी। इसलिए अगर आप अपने जीवन में निराशा से घिरे हुए है या रोज़मर्रा दिनचर्या से परेशान है तो आपके लिए ऐसी साधारण कथाये भी बड़ी मददगार साबित हो सकती है।

दूसरा लाभ यह हो सकता है कि अगर आप हर रोज एक भी कहानी सुनते है तो आप अपने जीवन में हर रोज एक नैतिक मूल्य जोड़ रहे है। नैतिकता आपको सदाचारी जीवन की ओर ले जाएगी। जिसके कारण आप गलत राह पर जाने से बच जायेंगे या जाने से पहले दस बार सोचोगे।

मेरा ऐसा मानना है कि कहानियाँ हर आयु के इंसानों के लिए होती है। क्योंकि, यदि कहानियाँ अगर सिर्फ बच्चों के लिए होती तो आप थिएटर, टीवी या लैपटॉप पर ऑनलाइन स्ट्रीमिंग करके फिल्में नहीं देख रहे होते। दूसरी ओर व्हाट्सऐप के साथ सभी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स आप खुद की कहानी बनाके डालते है। इससे आप समझ ही सकते है कहानियाँ इंसान के जीवन में अब कितना बड़ा किरदार अदा कर रही है।

आप कहानियों के बारे में क्या सोचते है कमेंट बॉक्स में जरूर बताए। तो चलिए शुरू करें आजकी पहली कहानी।

New moral stories in Hindi:

मेहनती राहुल:

राहुल दो सालों से एक ऑफिस में काम करता था। उस ऑफिस के कुछ लोग राहुल के उस अच्छे काम से ईर्ष्या रखते थे। एक दिन दोपहर के वक्त राहुल खाना खा रहा था। तभी पासवाले टेबल से लोगों के बातों की आवाजे सुनाई दी। लकड़ी की दीवार के कारन बिना उन लोगों को समझे उनकी आवाज सुन सकता था। राहुलने सुना की उसके साथी कर्मचारी प्रमोशन के बारे में बात कर रहे हैं।

उसमें से एक बोला की, “इस बार उसे प्रमोशन नहीं मिलाने वाला।”

दूसरे ने पूछा, “क्यों?”

पहले व्यक्ति ने जवाब दिया, “बॉस ने कहा हैं की, अगलेही महीने राहुल को कोई ना कोई बहाना बनके निकाल देंगे।”
उस ऑफिस कर्मचारी की बात को सुनकर राहुल थोड़ा डर सा गया। अब राहुल जल्दी से अपना डिब्बा ख़त्म कर, फिर से काम करने लगा।

इत्तिफ़ाक़ से अगले ही महीने राहुल को बोस ने केबिन में बुलाकर बोले, “राहुल, क्या बात है आजकल तुम्हारे काम की तेजी कुछ कम हो गयी है? क्या कुछ खास बात है?”

अब राहुल को लगाने लगा की उस दिन सुनी बात शायद अब सच होने जा रही है। राहुल बोला की, सर, मुझे पता है कि, आप मुझे कंपनी से निकालना चाहते हैं। राहुल की बात सुनकर बॉस हैरान हो गए। बॉसने राहुल से पूछा, “राहुल तुम्हे यह बात किसने कही कि, में तुम्हे कंपनी से निकालना चाहता हूँ।”

तब राहुलने पूरी बात बताई बॉस को बताई। कहानी सुनाने के बात मुस्कुराते हुए बॉस बोले कि, “राहुल में तुम्हें एक कहानी सुनाता हूँ।”

बेवकूफ बैल और शातिर खरगोश:

जंगल में एक बैल रहता था जो शेर का अच्छा मित्र था। हर दिन शेर अपनी भूक मिटाने के लिए जंगल के एक जानवर को खा जाता था। लेकिन अच्छे दोस्त होने के कारन, शेर बैल को खाने के बारे में नहीं सोचता था।

उसी जंगल में एक शातिर खरगोश रहता था। जो शेर और बैल की दोस्ती से बहुत जलता था। एक दिन चारा खाने के बाद बैल आराम करने पेड़ के निचे आया। तभी झाड़ियों के पीछे से वह खरगोश अपने दोस्त लोमड़ी के साथ उंचे आवाज में बात करने लगा।

बैल वह बाटे कान लगाकर सुनाने लगा। खरगोश बोला की, तुम्हे पता है, बैल अभी तक कुंवारा क्यों हैं?
लोमड़ी बोली, “नहीं, क्यों?”

तब खरगोश बोला, “क्योंकि जो भी गाय जंगल में आती है, उसे शेर खा जाता है।”

बैल को इस बात से बड़ा दुःख हुआ। इसी बात के कारन बैल और शेर के दोस्ती में दरार आ गयी। एक दिन शेर शिकार पर निकलते समय रस्ते में आकर बोला, कि में तुम्हे आज से शिकार नहीं करने दूँगा। बहुत समझने के बावजूद बैल नहीं समझा। आखिर में बेचारा बैल खुद शेर का शिकार बन बैठा।

बॉस हँसते हुए बोले कि देखो राहुल शातिर खरगोश और लोमड़ियाँ तुम्हे हर जगह मिलेंगी। वो तुम्हारे रिश्तों के साथ तुम्हारे काम को बिगाड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे। अब तय तुम्हें करना है कि, उनकी बातों का अपने काम पर कितना असर पड़ने देना हैं।

सिख: किसीने कही हर बात पर आँख मूंदकर भरोसा नहीं करना चाहिए। भरोसा करने से पहले उस बात कि पुष्टि करना अनिवार्य हैं।

Read Genius Tenali Rama Stories in Hindi

Motivational moral stories in Hindi:

दो हजार रुपये की नोट:

प्रदीप हमेशा अपने माता-पिता से पूछता की, इस दुनिया में सबसे कीमती वास्तु कौसी है?
कुछ दिनों बाद पिताजी ने प्रदित से कहा: “प्रदीप बेटे, चलो मेरे साथ आज के सेमिनार में तुम्हे तुम्हारे सवाल का जवाब मिल जायेगा।”
प्रदीप तुरंत तैयार होकर अपने पिताजी के साथ चला गया।

उस सेमिनार के वक्त ने हाथ में दो हजार रुपये की नोट लेकर सबको दिखते हुए अपनी बात शुरू की| वक्ता ने पूछा, “यह दो हजार रुपये का नोट कोई लेना चाहेगा?”

कई सारे लोगों ने अपने हाथ ऊपर किये।

फिर वक्ता बोले, यह नोट किसे व्यक्ति को देने से पहले, मैं इस नोट के साथी कुछ करना चाहता हूँ।
अब वक्ताने उस नोट को मुठ्ठी में लेकर कई जगहों से मोड़ दिया।

फिर वक्ता ने पूछा, “अब यह नोट कौन-कौन लेना चाहेगा?”
बहुत सारे लोगों ने फिर से अपना हाथ खड़ा किया।

वक्ता बोले, “अच्छा, अभी नोट साफ सुथरा है इसलिए आप शायद अभी भी इस नोट को लेना चाहते होंगे। अब में इस नोट को निचे गिराकर पैरोंतले कुचल दूँ तो?

क्या फिर भी आप इस नोट को लेना चाहेंगे?

और अब उस वक्ता ने दो हजार रुपये का नोट जमीन पर गिराकर पैरोंतले रोंद दिया।

अब वक्ताने वह गंदा नोट हाथ में लेकर कहा, अब ये नोट किस-किस को चाहिए?

निचे बैठे कई सारे श्रोताओं ने फिर से अपने हाथ खड़े कर दिए।

वक्ता बोले, “दोस्तों, आप सभीने इस सेमिनार में एक महत्वपूर्ण सबक सीखा है। मैंने आज दो हजार की नोट के साथ इतना सब करने के बाद भी, आप इस नोट को लेना चाहते थे, क्यों क्योंकि यह सब होने के बाद भी इस नोट का मूल्य तनिकभर भी कम नहीं हुआ। वह अभी भी दो हजार रुपये ही हैं। इसी तरह जीवन में हम बहुत बार गिरते हैं।

कई बार हमारे निर्णय ही, हमारे गिराने की वजह बनाते हैं। कई बार जिंदगी में ऐसा भी लगता हैं, की हमारी जीवन में कोई कीमत नहीं हैं। लेकिन,दोस्तों एक बात समझ लो आनेवाले जिंदगी में चाहे जो कुछ हो जाए, तथा भविष्य में चाहे आपके साथ कोई भी घटना घटित होनेवाली हो। आपका मूल्य जीवन में कभी भी कम नहीं होता। एक बात जिंदगी में हमेशा याद रखे: आप अपने जिंदगी में खास हो।”
यह पूरा सेमिनार सुनकर प्रदीप को अपने प्रश्न का जवाब मिल गया।

सिख: किसी भी व्यक्ति के प्राण उस व्यक्ति के लिए दुनिया की सबसे कीमती चीज होती हैं।

Chhatrapati Shivaji Maharaj moral stories:

शेर बेटा:

सत्र वीं सदी की बात है जब हिंदुस्तान पर मुग़ल साम्राज्य का अधिपत्य था। और महाराष्ट्र में बहमनी साम्राज्य के अंत के साथ बहमनी साम्राज्य छोटे-छोटे पांच टुकड़े में बट गया। उसी टुकड़े में से एक था बीजापुर वहाँ “शाहजी’ नाम के एक बड़े सरदार थे। जो हर दिन अपने सुल्तान की सेवा में दरबार में हाज़िर रहते।

शाहजी का एक बेटा भी था जिसका नाम था शिवबा। शाहजी को एक बार लगा की क्यों न एक बार शिवबा को भी साथ में लिया जाए। आखिरकार उसे भी तो मेरे जैसा एक बहादुर सरदार बनना है। और बड़े औंधे पर काम करने के लिए अच्छा होगा की अभी से दरबार के नियमों से परिचित रहे। इसलिए, उन्होंने शिवबा को भी दरबार जाने के लिए तैयार होने के लिए कहा। शिवबा ने भी बिना कुछ पूछे तैयार होकर आ गया।

कुछ ही देर में दोनों घोड़ों पर सवार होकर दरबार पहुँचे।

दरबार के रिवाज के अनुसार झुक कर शाहजी ने तीन बार सुल्तान को कॉर्निश किया। और फिर शिवबा से बोले, “बेटा में कर रहा हूँ, ऐसे सुल्तान को प्रणाम करो।”

तब शिवबा बोला, “पिताजी प्रणाम तो खड़े रहकर भी किया जा सकता है। फिर आप झुक कर क्यों कर रहे है?”

शाहजी बोले, “क्योंकि, बेटा सुल्तान हमारे अन्नदाता और पालन हार है।”

शिवबा बोला, “लेकिन, पिताजी माँ हमेशा कहती है, की यह सिर माता, पिता, गुरु, और माँ भवानी के अलावा किसीके आगे मत झुकाना। और मुझे भी माँ की यह बात सही लगती है। इसलिए, मेरा सिर आपके, माता के, गुरु और माँ भवानी के अलावा किसीके आगे नहीं झुकेगा।”

उस छोटे बच्चे का इतनी छोटी सी आयु में इतना बड़ा साहस देखकर बीजापुर के दरबारी चकित रह गए। शाहजी ने थोड़े गुस्से से शिवबा की तरफ देखा। फिर शाहजी ने स्थिती को संभालते हुए सुल्तान से विनम्र स्वर में कहा, “हुजूर शिवबा अभी बच्चा है, इसलिए दरबार के रिवाज़ों से परिचित नहीं, इसकी भूल को क्षमा कर दे।”

उस छोटे शिवबा की बातों से शाहजी अंदर ही अंदर खुश थे। शाहजी को अब शिवबा माँ जिजाबाई के संस्कारों पर पक्का यहीं होने लगा था। इसलिए, शाहजी ने जिजाबाई के साथ शिवबा को महाराष्ट्र के पूना में भेज दिया। जहाँ से शिवबा ने हिंदवी स्वराज्य की स्थापना की। और देखते ही देखते उसी शिवबा ने ३५० किल्ले जीतकर लोगों को छत्र प्रदान करनेवाले छत्रपति शिवाजी महाराज बने।

सिख: संस्कार अपने माता- पिता से मिलने वाली सबसे बड़ी विरासत होती है।

कर्तव्यपरायण सावल्या तांडे:

अब में जिसकी कहानी सुनाऊँगा वह भारत के आदरणीय और प्रिय छत्रपति शिवाजी महाराज की सेना का एक सिपाही था। जिनका नाम था सावल्या तांडे जो सेना में कुछ ही दिन पहले भर्ती हुआ था। आपने अगर राजा शिवछत्रपती की जीवनी पढ़ी हो, तो आपको उनके विस्मयकारी इतिहास को पहले से जानते होंगे।

लेकिन आज में आपको छत्रपति शिवाजी राजे की जीवनी से अलग कहानी सुनाऊँगा। जिससे आपको शिवाजी महाराज के सेना के हर एक सिपाही उनके प्रति कितना कर्त्तव्यनिष्ठ था, इसका अंदाजा आपको लग जायेगा।

छत्रपति शिवाजी राजे के बहुतसे किले थे। उन हर एक किलों पर उन्होंने बहुत ही कठोर नियम बनाये थे। उन नियमों में एक नियम था, की सूरज उगने से पहले और डूबने के बाद, किसीको भी अंदर या बाहर जाने ना दिया जाय।

छत्रपति शिवराय ने अपने हर एक किल्लेदार से, इस नियम को भी कठोरता के साथ पालन करने को कहा था। उनके एक किल्ले में सावल्या नाम का सिपाही तैनात था।

एक दिन किल्लेदार ने सूरज डूबने के बाद किले के प्रवेशद्वार पर पहरेदारी की जिम्मेदारी सौपी। सावल्या को अपना काम बहुत बारीकी से करने की आदत थी। उसने प्रवेशद्वार पर पहरेदारी शुरू की। देखते ही देखते किले के चारो तरफ अँधेरा छा गया। कुछ देर बाद घोड़ों के टापों की आवाज सुनाई देने लगी। थोड़े देर में वहाँ घोड़े सवार सरदार आया।

सावल्या ने उसे रोककर पूछा, “श्रीमान, आपको अंदर जाने नहीं दिया जा सकता।”

सरदार बोला, “लेकिन, में तो सरदार हूँ। मुझे अंदर छोड़ने में कैसी परेशानी?”

तब सावल्या बोला, “नहीं श्रीमान, चाहे कोई भी व्यक्ति क्यों न हो, नियम सब के लिए एक होता है। वैसे भी सूर्यास्त के बाद अंदर किसी को भी ना जाने दिया जाय, ऐसा महाराज का सक्त नियम है।”

सरदार बहुत समय तक सावल्या को मनाता रहा लेकिन कुछ भी करके सावल्या मानने को तैयार नहीं था। कुछ देर यह बहस चलती रही।

आखिरकार सरदार को गुस्सा होकर बोला, “अरे ए छोरे, यहाँ नए लगते हो। तुम मुझे जानते नहीं। अगर मैंने तुम्हारी शिकायत महाराज से कर दी तो तुम नौकरी से हाथ धो बैठोगे। और वैसे तुम मुझे अंदर जाने दोगे, तो किसे पता चलेगा की, तुमने मुझे अंदर जाने दिया? इसीलिए, अच्छा होगा कि, तुम मुझे अंदर जाने दो, तेरी भी चुप और मेरी भी चुप।”

फिर सावल्या बोला, “आप कुछ भी बोले, तो भी में आपको अंदर जाने देकर, महाराज का आदेश नहीं तोड़ सकता।”
अब सरदार आगबबूला हो गया, “अरे मूर्ख, महाराज तो बाद में तुम्हें नौकरी से निकालेंगे। लेकिन उससे पहले में चाहूँ तो इसी वक्त तुम्हारा सिर धड़ से अलग कर दूँ।”

सावल्या ने निर्भीकता का परिचय देते हुए, लेकिन शाँतिपूर्ण भाव से जवाब दिया, “श्रीमान, आप मुझसे लढना ही चाहते है तो यही सही। मैं लढने के लिए तैयार हूँ। लेकिन, मेरे जीतेजी मैं आपको किले के भीतर प्रवेश नहीं करने दूँगा।”

अब सरदार ने घोड़े से उतरकर अपनी तलवार निकाली। सावल्या ने भी तलवार म्यान से निकाली। सरदार आक्रमण के लिए सावल्या के नज़दीक आते ही, उसने अपना भाव बदल दिया। और सावल्या से कहा, “अरे पगले, पहचाना नहीं? मैं ही शिवाजी महाराज हूँ।”

उस सरदार की इस बात को सुनकर सावल्या थोड़ा सा हड़बड़ाया। और बोला, “श्रीमान, माफ़ करें लेकिन यह नियम सबके लिए निर्धारित किया गया हैं। इसीलिए, अगर आप छत्रपति शिवाजी महाराज भी हो, तो भी आपको में अंदर नहीं जाने दे सकता।”

सावल्या की बात को सुनकर सरदार मुस्कुराते हुए घोड़े पर बैठ के वहाँ से निकल गया। पूरी रात पासवाले गाँव में बिताकर, सूर्योदय के समय वापस से प्रवेशद्वार के पास आया।

सूर्योदय होने के बाद, सावल्या ने उस सरदार को प्रवेश दे दिया। वह सरदार के भेंस में और कोई नहीं बल्कि सच में छत्रपति शिवराय ही थे।

दरबार सुरु होने के बाद, शिवाजी राजे ने प्रवेश द्वार पर कल रात को पहरा देनेवाले पहरेदार को बुलाने का आदेश दिया।
इस दौरान कल रातवाला किस्सा प्रजा में फैल गया। हर किसीके मुख पर उसी बात की चर्चा सुनाई दे रही थी।

हर कोई अचरज कर रहा था कि, सावल्या ने खुद शिवजी राजे को ही प्रवेशद्वार पर रोका और अंदर नहीं आने दिया। लोग सावल्या पर गुस्सा थे, लोग सोचते थे, “उसकी इतनी हिम्मत। महाराज अब क्या सजा देंगे क्या पता?”

उतने में सावल्या दरबार में पहुँच गया। दरबार में सिर नीचे झुकाये और खुद को अपराधी मानते हुए खड़ा हुआ।
शिवराय बोले, “अब तो विश्वास हुआ या नहीं की मैं ही शिवजी महाराज हूँ।”

सावल्या इस दौरान चुप ही रहा।

तब महाराज सावल्या से बोले, ”तुम्हारे हिसाब से, जिसने खुद शिवाजी महाराज को अंदर प्रवेश देने से मना किया। उस व्यक्ति को क्या सजा मिलनी चाहिए।”

तब सावल्या धीमी आवाज़ में बोला, “महाराज, आप ही का नियम हैं न..कि एक बार नियम बनता है, तो वह सब पर लागू है। उस नियम का पालन सभी को करना अनिवार्य हैं। उस नियम के लिए कोई भी अपवाद नहीं। मैंने तो आप ही के बनाए उसूलों और नियमों का पालन किया है।”

“फिर भी, आप खुद महाराज है, इसीलिए, आपको अगर मेरा बर्ताव सही नहीं लगता है। तो आप मुझे जो चाहे सजा दे सकते है।”

तब शिवराय बोले, “नही, सावल्या तुम काबील हो लेकिन सजा के नही बल्कि पुरस्कार के। तुमने आज सबके सामने मिसाल कायम की है कि, खुद शिवाजी महाराज ही क्यों न हो, नियमों का पालन सभी को करना चाहिए।”

ऐसा बोलते हुए उन्होंने खुद के हाथ का सोने का अलंकार सावल्या को भेट स्वरुप दे दिया।

इस प्रकार सावल्या ने अपने कर्तव्य का पालन किया। और शिवाजी महाराज ने भी उनके व्यवहार से यह साबित किया कि, उनके बनाये नियम वो खुद भी कभी नहीं तोड़ते।

सिख: कौन सी भी स्थिति में कर्तव्य का पालन करना नहीं छोड़ना चाहिए। और एक बार बने नियमों का पालन करना सभी का कर्तव्य बन जाता है। तब चाहे वो नियम खुद अपने ही क्यों न बनाया हो।

Read interesting Akbar Birbal stories in Hindi with moral

निर्भीक केशव:

उन्नीसवीं सदी की बात है, महाराष्ट्र के पुणे जिले में एक पाठशाला थी। उस पाठशाला की एक कक्षा के अध्यापक कुछ समय के लिए काम से बाहर चले गए। तब कक्षा के सभी छात्र मस्ती कर रहे थे, उसमे से किसी छात्र ने मूंगफली अपने घर से लायी थी। जो सभी मस्ती करने वाले छात्र मिलकर खा रहे थे। इन मस्तीखोर छात्रों से अलग एक बच्चा था जिसका नाम था केशव। वह उन मस्तीखोर छात्रों में शामिल नहीं था और सबसे अलग बैठा था।

थोड़े ही देर में अध्यापक कक्षा में आए और उन्होंने देखा की पूरी कक्षा में मूंगफली के छिलके फैले हुए है। तब अध्यापक ने सभी छात्रों से प्रश्न किया कि कक्षा में मूँगफलियाँ किसने खाई? सभी छात्र एक-दूसरे की और देख रहे थे, लेकिन कोई किसी का नाम नहीं बता रहा था।

अध्यापक ने और एक बार पूछा कि मूंगफली खाकर कक्षा में छिलके किसने फैके? अगर किसी ने भी नहीं बताया तो पूरी कक्षा के छात्रों को दंड मिलेगा।

फिर भी कोई भी छात्र एक दूसरे का नाम लेने का लिए तैयार नहीं था। अब अध्यापक को गुस्सा आया और उन्होंने हर एक छात्र को एक के बाद एक छड़ी से मारना शुरू किया।

अब बारी केशव की आयी जिसने ना मूँगफलियाँ खाई थी और ना बाकि छात्रों के साथ मस्ती की थी। मास्टरजी ने उसे एक बार फिर पूछा क्या तुमने मूँगफली खाई। केशव बोला नहीं मास्टरजी, मैंने मूँगफली नहीं खाई। तब मास्टरजी ने जिसने कक्षा में मूँगफलियाँ खाई उसका नाम बताओ।

तब केशव ने निर्भीकता से मास्टर जी से कहा कि, “मैंने मूँगफलियाँ नहीं खाई और ना पूरी कक्षा में उसके छिलके फेंके इसलिए, में छड़ी नहीं लूँगा क्योंकि इसमें मेरी कोई गलती नहीं। और मुझे चुगली करने की आदत भी नहीं है इसलिए, में किसी छात्र का नाम भी नहीं बताऊँगा।”

इतने छोटे छात्र का इस तरह से बात करना उस अध्यापक को रास नहीं आया। इसलिए, मुख्याध्यापक के सामने ले जाकर केशव को पाठशाला से निकाल दिया। घर जाने के बात केशव ने सारी बात अपने पिताजी से कही। दूसरे दिन पिताजी केशव को लेकर पाठशाला गए।

उन्होंने मुख्याध्यापकजी से कहा की मेरा पुत्र सही बोल रहा था, वो घर के खाने की चीजों के अलावा बाजार की किसी वस्तु की और देखता तक नहीं। मेरे पुत्र की गलती होने पर में मेरे पुत्र को पाठशाला से निकलते एक बार देख सकता हूँ। लेकिन बिना किसी गलती या अपराध के उसे दंडित होते या मर कहते नहीं देख सकता। केशव के पिताजी की यह बात सुनकर मुख्यध्यापकजी पूरी तरह शांत हो गए।

इसी बाल आगे जाकर बालगंगाधर तिलक के नाम से भारत में प्रसिद्ध हुए। उन्होंने अपने भारत देश के स्वतंत्रता संग्राम में बड़ी भूमिका निभाई और लोगो ने उन्हें लोकमान्य कहकर संबोधित किया। साथ में उन्होंने “स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और में इसे प्राप्त करके रहूँगा।”

सिख: अगर आपने कुछ गलत नहीं किया है, तो आपको किससे भी डरने की जरुरत नहीं।

सच्चाई कि राह:

एक पाठशाला में एक दिन वहाँ शिक्षा अधिकारी पाठशाला के निरीक्षण हेतु आने वाले थे। इसलिए सभी शिक्षक कर्मचारी उस दिन अच्छे कपड़े पहने समय से पहले पाठशाला में उपस्थित थे।

सभी कक्षाओं में नियमित समय पर छात्रों को पढ़ना शुरू कर दिया गया। तभी वह शिक्षा अधिकारी का आग मन हुआ, जो पाठशाला के हर एक हिस्से कि बारीकी से जाँच करने लगा। सभी हिस्सों के निरीक्षण करके वह अधिकारी हर एक कक्षा में जाकर अध्यापक और छात्रों से सवाल जवाब करने लगा।

ऐसे ही उन्होंने एक कक्षा में उन्होंने प्रवेश किया। वहाँ अंग्रेजी के अध्यापक छात्रों को अंग्रेजी का पाठ पढ़ा रहे थे। अधिकारी ने चार छात्रों को खड़ा किया और हर एक को एक अंग्रेजी शब्द बोलकर छात्रों को स्लेट पर उस के स्पेलिंग लिखने के लिए कहा।

कक्षा के शिक्षक को पहले से पता था, की सभी छात्र प्रश्न का उत्तर नहीं दे पायेंगे। इसलिए, कक्षा में एक दिन पहले ही कहा था, की अगर किसी छात्र को किसी सवाल का जवाब ना आए, तो पास वाले छात्र उस उस प्रश्न का जवाब उस छात्र को बता दे।

उन चार छात्रों में एक मोहन था जिसे बताया शब्द का स्पेलिंग लिखने नहीं आ रहा था। इसलिए पास वाले छात्र ने उसका सही स्पेलिंग अपने स्लेट पर लिख के मोहन को दिखाने लगा। सामने जो अध्यापक थे उन्हें भी पता चल गया था की मोहन को उस शब्द का स्पेलिंग लिखने नहीं आ रहा।

इसलिए, उन्होंने बिना शिक्षा अधिकारी को पता चले मोहन को पास वाले छात्र की स्लेट से नक़ल करने के लिए इशारा किया। लेकिन मोहन ने वैसा नहीं किया, आखिरकार मोहन के अलावा सभी छात्रों को आ गया। क्योंकि कुछ छात्रों ने नक़ल करके स्पेलिंग लिखा था।

एक छात्र को लिखने नहीं आने पर वह अधिकारी थोड़े नाराज होकर अगले कक्षा की और चले गए।

मोहन को अध्यापक ने पास वाले छात्र का देखकर क्यों नहीं लिखा यह पूछने पर मोहन बोला की, “दूसरे की नक़ल करना तो पाप होता है, इसलिए।”

इतने छोटे बालक के मुख से इतनी बड़ी बाते सुनकर अध्यापक स्तब्ध रह गए।

आज के ज़माने में दूसरों की नक़ल करना करने की वृत्ति छात्रों में बढ़ती जा रही है। लेकिन मोहन ने हमेशा सच्चाई की राह पकड़ी और कॉपी या नक़ल करना कभी नहीं सीखा। यही मोहन आगे जाके भारत को आज़ाद करने में अहम भूमिका निभाई। और मोहनदास करमचंद गाँधी बनकर भारत के एक अग्रणी नेता बने।

सिख: सच्चाई कि राह पे मुश्किल जरूर होता है, लेकिन एक दिन आपका सफल होना तय है।

Read Motivational Truth story of Raja Harishchandra

कंजूस सुंदरलाल:

हरी किशन नाम का एक युवक विलासनगर में रहता था। वह एक छोटे कंपनी में नौकरी करके घर चलाता था। सुंदरलाल नाम का एक मित्र हर समय उसके गाँव से आता तो हरी किशन के घर जरूर जाता। एक त्यौहार के समय फिर से सुंदरलाल हरी किशन के घर आ गया। उसे देखकर हरी किशन मन ही मन चिंता में पड़ गया।

हरी किशन को चिंता भरी मुद्रा में देखकर उसकी पत्नी ने पूछा, “क्या बात है? आप परेशान लग रहे है?”

हरी किशन बोला,”कोई खास बात नहीं, लेकिन मेरा जो मित्र घर पे आया है, वह बहुत ही कंजूस आदमी है। इसलिए, वह जब ही हमारे घर आता है, उसके सारे खर्चे मुझसे ही करवाता है।”

तब हरी किशन की पत्नी बोली की, “आप बिलकुल भी चिंता ना करे, में आपको उसपर इलाज बताती हूँ।”

दूसरे ही दिन हरी किशन अपने मित्र को साथ में लेकर भ्रमण करने ले गया। इस बार हरी किशन ने अपने मित्र सुंदरलाल को सबक सिखाने का सोचा।

घूमते घूमते दोनों शहर के बाजार वाले जगह आ पहुँचे। तब हरी किशन सुंदरलाल से बोला आपको जो भी लेना चाहिए बेझिजक मुझसे कहिये में आपको वो दिलवा दूँगा।

तब हरी किशन उसे होटल ले गया, और हर किशन ने वहाँ के होटल कर्मचारी से पूछा, “भैया, होटल का खाना कैसा है?”

तभी होटल मालिक वहाँ आता है, और बोलता है, “श्रीमान, होटल का खाना बिलकुल मिठाईयों की तरह स्वादिष्ट है।”
तब हरी किशन ने उस सुंदरलाल से कहा खाना अगर मिठायों की ही तरह है, तो चलो मिठाईयाँ ही ले लेते है।

दोनों मिठाई के दुकान गए तब फिर से हरी किशन ने दुकानदार से पूछा, “मिठाईयाँ कैसी हैं?”

तब दुकानदार बोला, “महाशय, मिठाईयाँ बिलकुल शहद की तरह मीठी है, चाहे तो चखकर देखें।”

हरी किशन फिर से अपने दोस्त सुंदरलाल को बोला, “मिठइयाँ अगर शहद की ही तरह है, तो हमें शहद ही लेना चाहिए।”

अब दोनों शहद बेचनेवाले दुकानदार के यहाँ गए। तब हरी किशन ने फिर से पूँछा, “भैया शहद कैसा है?”

तब उस दुकानदार ने जवाब दिया, “हमारा शहद बिलकुल जल की तरह निर्मल और शुद्ध है।”

अब हरी किशन ने अपने मित्र से कहा, “चलो में तुम्हे आजतक का सबसे शुद्ध भोजन देनेवाला हूँ।”

हरी किशन ने पानी से भरा घड़ा सुंदरलाल को दिया। अब सुंदरलाल को अपनी गलती का अहसास हुआ। सुंदरलाल समझ चूका था की, हरी किशन यह सब उसे ही सबक सिखाने हेतु कर रहा है। सुंदरलाल ने अपने दोस्त हरी लाल से माफ़ी माँगी। माफ़ी मांगने पर हरी किशन ने भी उसे माफ़ कर ख़ुशी से गले लगाया।

दोनों मुस्कुराते हुए घर गए, जहाँ हरी किशन की पत्नी ने दोनों के लिए स्वादिष्ट भोजन परोसा। पेटभर भोजन के पश्चात सुंदरलाल ने गाँव के लिए प्रस्तान किया। उस दिन से सुंदरलाल की कंजूसी हमेशा के लिए छूट गयी।

सिख: सबको हमेशा आत्मनिर्भर रहना चाहिए और दूसरों कि अच्छाई का हद से ज्यादा फायदा नहीं लेना चाहिए।

जीतने का मतलब:

एक छोटेसे गांव में शाम नाम का लड़का रहता था| उसके पिता मजदूरी करके बड़े मुश्किल से घर चलाते थे| शाम के पिताजी एक दिन शाम को अपने साथ शहर ले गए| क्योंकि उनको एक बड़े मैदान की सफाई का काम मिला था| उस मैदान में एक दौड़ प्रतिस्पर्धा का प्रबन्ध करना था|

वह विशाल मैदान देखकर शाम अत्यधिक खुश हुआ| उस दिन से शाम के मन में भी दौड़ने का जूनून सवार हो गया| पिताजी द्वारा सफाई का काम पूरा होने पर, वह गांव लौटने के लिए निकल पड़े| गांव लौटते समय शाम पिताजी से जिद करने लगा की, हमारे गांव में भी दौड़ प्रतियोगिता का आयोजन होना ही चाहिए|

गांव के मुखिया के सामने अपनी राय रखी| उन्होंने गांव के प्रधान को बताया की, यदि आप प्रतिस्पर्धा रखते है, तो गांव के बच्चो को अपनी कबिली दिखने का मौका मिलेगा, और साथ-साथ गांव की प्रसिद्धि भी बढ़ेगी|

गांव के मुखिया ने अपनी सहमाति दी| अगले हफ्तेसे प्रतिस्पर्धा की तैयारियाँ शुरू हो गयी| आसपास के गांव से कई सारे बच्चे इस दौड़ प्रतियोगिता में हिस्सा लेने आ गए|

शाम के दादाजी यह सब शांतिपूर्व मन से देख रहे थे| वे चाहते थे की, शाम अपनी तरफ से जितने की पूरी कोशिश करे| क्योंकि, यह प्रतिस्पर्धा अत्याधिक कठिन थी| लेकिन, शाम ने अपने आप से संकल्प किया था, की उसे ही जितना है| सरे बच्चे तैयार हुए, निर्देशी ने सिटी बताते ही प्रतिस्पर्धी बच्चे निर्धारित रेस लाइन की तरफ भागने लगे|

पथरीले रस्ते, छोटे नोकीले कंकड़, तेज धुप इन मुश्किलों को पर करते हुए, शाम ने आखिरकार रेस जित ली| पूरा मैदान तालिओं की गूंज से लहर उठा|

उसके बाद शाम ने एक के बाद एक प्रतिस्पर्धा में भाग लेना शुरू किया| शाम हर प्रतिस्पर्धा में जीतता था| शाम के जीवन में जीत का सिलसिला सुरु हो गया था| पर शाम के दादाजी अपने मन ही मन यह सब देखकर दुखी होते थे| एक दिन खुद दादाजी ने शाम के लिए विशेष दौड़ का आयोजन किया| दौड़ का आयोजन देख शाम उल्लासपूर्ण मन से मैदान आया|

उस समय दादाजी ने शाम से कहा की बेटा, हर रेस को जितने के भिन्न भिन्न तौर-तरीके होते हैं| इसे बार सोच समझकर दौड़ना| दादाजी की बात शाम के कुश समझ नहीं आयी|

इस बार भी आसपास के गाओं से लोग प्रतिस्पर्धा देखने आये थे| शाम ने देखा की इस दौड़ प्रतियोगिता में उसके आलावा सिर्फ दो प्रतिस्पर्धी है| स्पर्धा निर्देशी ने सिटी बजाते ही, शाम पूरी ताकत से रेस लाइन की तरफ दौड़ा| वह आखिरी पड़ाव में पहुंचने ही वाला था, तभी उसने देखा की बाकि के प्रतिभागियों ने दौड़ना शुरू भी नहीं किया है|

शाम ने देखा की, एक प्रतिस्पर्धी अंधा है, तो दूसरा लंगड़ा| मैदान मई अब शांति छा गयी| शाम ने आखिरी पड़ाव से वापस गया और उन प्रतिपर्धियों के हाथ पकड़कर उनको रेस लाइन तक धीरे-धीरे लिकर गया| तीनो प्रतिस्पर्धी ने एकसाथ रेस लाइन पार की| इस दृश्य को देखकर दर्शकोने की तालियों से पूरा मैदान गूंज उठा|

तब, शाम के दादाजी बोले की, बेटा आज मुझे पूरा यकीं हो गया, की तुम ही असली विजेता हो|

सिख: जीवन में हर दौड़ में जितना जरुरी नहीं, बल्कि जो इंसान सभी लोगोंको साथ लेकर चलता है, वही इंसान सभीके दिलो में जगह बनता है|

अच्छाई की जित:

कासार नाम का एक गाँव था जो चारों तरफ से घने जंगलों और पहाड़ों से घिरा था। उसी गाँव में एक मेघना नाम कि लड़की रहती थी। जो अपने सखी चारुलता के यहाँ जाने के लिए इच्छुक थी। वह बहुत दरिद्र होने के कारन रोटी के एक-एक टुकड़े के लिए उसे तरसना पड़ता था। वह इस कदर निर्धन थी की उसे सहेली के घर जाने के लिए भी एक ही रोटी थी।

उस दिन सर्दी के मौसम में शीतलता अपने चरम पर थी। ऐसे विपरीत हालात में रोटी का टुकड़ा थैली में लेकर वह सहेली के यहाँ जाने के लिए निकली। कुछ देर चलने पर रास्ते में उसे एक बूढ़ा व्यक्ति बैठा नजर आया। उस वृद्ध व्यक्ति ने मेघना से कहा की में पिछले तीन दिन से भूखा हूँ, मुझे कुछ खाने को दे दो। मेघना ने अपने पास बची एक रोटी उस बूढ़े को दे दी। उस वृद्ध ने पुरे मन से मेघना को आशीर्वाद दिया।

उसके बाद मेघना आगे बढ़ी कुछ समय चलने पर पेड़ के निचे उसे एक छोटा बच्चा मिला। वह बच्चा कड़ी सर्दी में बहुत कम कपड़ों में वहाँ बैठा था। जिसके कारन वह बच्चा सर से पॉंव तक काँप रहा था। उस बच्चे ने मेघना से गुजारिश कि, की मुझे कुछ ओढ़ने कुछ को दे दो। उस बच्चे पर मेघना को दया आयी, तब मेघना ने बिना कुछ विचार किये, अपने पास जो शौल थी, उससे उस बच्चे को ढंक दिया।

मेघना अब आगे बढ़ी, लेकिन अब वह खुद सर्दी के कारन काँपने लगी। अब उसे ठंड के कारन कुछ सूझ नहीं रहा था, जिसके कारन वह खुद पेड़ के निचे सिकोड़कर बैठ गयी।

निचे बैठने पर उसकी नजर आकाश की तरफ गयी। तभी आसमान से एक तारा गिरा, वह तारा सीधा उसके नजदीक आके गिरा। उसने गौर से देखने पर उसे पता चला की, वह तारा नहीं बल्कि सोने का सिक्का है। देखते ही देखते उसके कपड़े सुन्दर कपड़ों से बदल गए। उसके पैरों में अब मखमली जूते थे। कपड़ों के ऊपर शौल थी, सामने एक सुन्दर फूलों से टोकरी थी। वह टोकरी मिठाइयों और स्वादिष्ट फलों से भरी थी। इस प्रकार ईश्वर ने उसके दयालु स्वभाव को इनाम और आशीर्वाद भी दिया।

सिख: ईश्वर भी दयालु, और दूसरों की मदत करने वाले व्यक्ति को ही मदत करता है।

Short moral stories in Hindi:

चूहे की आत्मगाथा:

म्हालसा नाम का एक छोटा लड़का था। जो बर्फीली पहाड़ी पर रहता था, वह अपने जीवन का बहुतांश समय पहाड़ी पर ही बीताता था। एक दिन म्हालसा निचले मैदान में आया।

उस समय लड़के ने बड़ा आकर्षक फरो से बना गर्म कोट पहन रखा था। बर्फीले पहाड़ी से निकलते समय जो ठंड बाकि थी वह मैदान में आते ही झट से भाग गयी। तब उसने अपना कोट उतरा और निचे जमीन पर फेंक दिया। कुछ समय पश्च्चात म्हालसा पूरी तरह पसीने भीग गया।

अब म्हालसा को सूरज पर बहुत गुस्सा आया। गुस्सा इस कदर आया की वह सोचने लगा सूरज का कुछ लाभ नहीं। म्हालसा क्रोधित होकर सूरज को कुछ दंड देने का सोचा। उसके लिए उसने तांत्रिक के पास जाने का फैसला। तांत्रिक से उसने एक जाल बनाने का कहा जिसमे वह सूरज को पकड़ सके। उसके हिसाब से जाल बना कर तांत्रिक ने म्हालसा को दे दिया।

अगले प्रातः के समय म्हालसा पहाड़ी पर गया। उस दिन शुरू होने के समय ही उसने सूरज को अपने जाल में पकड़ लिया। जिसके कारन उस दिन सूर्योदय हुआ ही नहीं। कोई भी जानवर भोजन जुटाने हेतु नहीं जा सके। दूसरी तरफ सभी जानवरों ने देखा की सूरज जाल में फंसा हुआ है।

तब सभी जानवरों ने चूहे को बुलाकर जाल कटाने के लिए मनाया। उस समय आज के तुलना में चूहे बहुत विक्राल रूप के और बड़े होते थे। चूहे ने सबकी बात मानते हुए पूरा जाल अपनी तेज कर्रार दाँतों काट दिया। सूरज को आज़ाद करने पर सभी प्राणी बहुत खुश हो गए। लेकिन चूहे को उसकी सजा मिली, क्योंकि सूरज की तेज गर्मी के कारन चूहे का आकार बहुत ही छोटा हो गया। यही कारन है, की चूहा अभी बहुत छोटा है।

सिख: कुछ पाने के लिए कभी-कभी हमें बहुत बड़ी कुर्बानी देनी पड़ सकती है।

समुन्दर का रहस्य:

समस्तीपुर नामक एक गाँव में दो भाई वास करते थे। बड़े भाई का नाम था सूरज और छोटे का नाम गौरव। बड़े भाई को एक तपस्वी साधू ने एक जादुई बर्तन प्रदान किया था। जो बर्तन मनुष्य की सारी इच्छाये पूरी करने में समर्थ था। सूरज जो भी इच्छा बताता बर्तन उसकी इच्छा तुरंत पूरी करता।

इसलिए, बड़े भाई की सारी इच्छाये पूरी होती थी। बड़े भाई सूरज की किस्मत और सुखी जीवन से छोटे भाई गौरव को जलन होने लगी। जिसके कारन उसने रात समय वह बर्तन चुराया और दूसरे देश जाने हेतु एक नाव में बैठकर समुन्दर के रस्ते भाग निकला।

गौरव ने जल्दी में होने के कारन, अभीतक उस बर्तन से कुछ भी नहीं माँगा था। आखिरकार उसे मध्यरात्रि के समय तेज भूक लगी, जिसके कारन उसने बर्तन से एक-एक मनपसंद व्यंजन का नाम लेके अपनी इच्छा प्रकट की। बर्तन ने झट से उसके बताये सारे स्वादिष्ट व्यंजन और कई तरह के पकवान गौरव के सामने हाज़िर किये।

खाना शुरू करने के बाद उसे थोड़ा नमक सब्जियों में कम लगा। जिसके कारन उसने बर्तन से नमक माँगा, अब नमक बर्तन से निकलने लगा। कोई भी चीज़ बर्तन से निकलना शुरू होने के बाद, उसे रोकने की विधि और मंत्र गौरव को पता नहीं था।

जिसके कारन कुछ ही देर में गौरव की नाव नमक से भरने के कारन डूब गयी। कहते है आज भी उसी चमत्कारी बर्तन से नमक निकल रहा है, जिसके कारन हमें समुन्दर का पानी खारा लगता है।

सिख: जो अपनेपास अभी है, उसी में खुश रहना सीखों।

महाकाय पर्वत का घमंड:

एक गाँव के नजदीक एक विशालकाय पर्वत था। एक दिन उस महाकाय पर्वत ने प्राणियों, पक्षियों और घने जंगलों को देखा। उसके बाद उसके उनके साथ खुद की तुलना की। तब उस पर्वत को अपने विशाल और विस्तीर्ण आकार पर बड़ा घमंड हुआ। उसने सबको कहा कहा इस संसार में मुझसे बड़ा और शक्तिशाली कोई नहीं, मैं ही सबका परमेश्वर हूँ। सभी जानवरों को उसका घमंड देख बड़ा गुस्सा आया। उन्ही प्राणियों में एक घोडा भी शामिल था। घोड़े ने उसकी बाते सुनकर रहा नहीं गया, और उसने उसका घमंड चूर-चूर करने की ठान ली।

उस घोड़े ने पर्वत से कहा, “ओ पर्वत महाशय, अपने रूप और शक्ति पर इतना घमंड ठीक नहीं।” में चाहु तो एक कुछ मिनटों में तुम्हे पार कर सकता हूँ।

पर्वत बोला,”ठीक है मुझे पार कर के दिखाओ तो में मानु।”

घोड़े ने उसकी शर्त मानकर उसे पूरी करने की ठान ली। लेकिन पर्वत बहुत विशाल था, और उसकी चट्टानें लगभग सीधी खड़ी थी, जिसके कारन घोड़े को चढाई करना मुश्किल हो गया। आखिरकार घोड़ा लड़घड़ा कर जोर से गिर पड़ा।

घोड़े ने शर्त हारने के वजह से पर्वत जोर से हँसने लगा। सब जानवर यह सब देखा, और उनमें से जिराफ, ऊंट, हाथी के साथ और भी कई जानवरों ने प्रयास किया। लेकिन उनमें से एक भी प्राणी पर्वत को पार नहीं कर पाया।

अब सभी जानवरों ने प्रयास किया था, लेकिन सिर्फ एक जानवर बाकि था, और वो था चूहा। सभी जानवरों ने उसे भी चुनौती देने के लिए प्रेरित किया। चूहे को अपनी काबिलियत भरोसा नहीं था, फिर भी सबके कहने पार चूहे ने भी पर्वत को चुनौती दे दी। अब तो पर्वत की हँसी रुकने का नाम नहीं ले रही थी। पर्वत को लगा बडेसे बड़ा जानवर मुझे नहीं हरा पाया तो, यह चूहा क्या चीज हैं। पर्वत ने चूहे का बहुत मजाक उड़ाया।

चूहे ने शांति से मुस्कुराते हुए पर्वत की तरफ देखा, और सामने से छेद करना प्रारंभ किया। अन्य चूहों ने भी इस काम में सहायता की। अब पर्वत के पसीने छूट गए। चूहों ने सामने कही जगहों पर काट डाला। आखिरकार पर्वत ने सभी प्राणियों से माफ़ी मांगी। इस प्रकार एक छोटे से चूहे ने विशाल पर्वत का घमंड तोड़ दिया।

सिख: एक निर्बल भी अगर ठान ले तो बड़े से बड़े दुश्मन को भी परास्त कर सकता है।

आदर्श घर:

जम्बलपूर गाँव में एक परिवार रहता था। जिसमें एक बेटी और उसके माँ और पिता शामिल थे। जिसमें बेटी का नाम स्नेहा था। जम्बलपूर गाँव में एक दिन तीन वृद्ध व्यक्ति आये। जिन्होंने गाँव के मंदिर में आसरा लिया। शाम के समय स्नेहा की माँ ने उन्हें देखा, वह सभी लोग बहुत थके और भूके लग रहे थे। इसीलिए, स्नेहा की माँ उन्हें घर पे भोजन के लिए आमंत्रित करती है।

लेकिन तीनो व्यक्तियों में से एक व्यक्ति बोला हम तीनो एक साथ आपके घर नहीं आ सकते आपको हम में से एक को चुनना पड़ेगा। वह तीनों व्यक्ति अपना नाम बताते है, पहले का नाम था, धन, दूसरे का नाम था, यश और तीसरे का नाम था, प्रेम। तीनों बोले आप आराम से घर जाकर सोचे, और रात को भोजन के समय किसी एक को आमंत्रित करने के लिए बुलाये।

तब स्नेहा की माँ घर आकर परिवार से पूछा, तब स्नेहा के पिता ने बोला कि, “धन को ही बुलाना चाहिए।”

स्नेहा के माता को लगा कि, “हमें यश को ही आमंत्रित करना चाहिए।”

लेकिन स्नेहा को लगा कि, “हमें प्रेम को ही बुलाना चाहिए।”

माता और पिता दोनों ने अपने बेटी का कहना मानते हुए प्रेम को घर भोजन हेतु आमंत्रित किया। प्रेम घर पे भोजन करने लगा, तब ग़ज़ब हो गया। उस व्यक्ति के साथी यश और धन दरवाज़े पे खड़े थे। उनसे पूछने पर वो दोनों बोले कि जहाँ प्रेम होता है, हमें भी वही जाने का मन करता है।

कहानी का अभिप्राय: संपत्ति से ईटों का घर बनाया जा सकता है। किसी काम में प्रयास करने पर आपको सफलता मिलने के मौके भी आपको कई सारे मिलेंगे। लेकिन जिस घर में स्नेह भरे परिवार जन हो ऐसे घर में सफलता और धन अपने आप आ ही जाता हैं।

सिख: जिनके घर में सभी परिवारजनों के बिच प्रेम होता है, उसी घर में शांति बनी रहती है, और ऐसे ही घर में यश और धन-सम्पत्ति वास करती हैं।

आज़ादी का मोल:

बिरजू नाम का एक आदमी था जो बहुत ही शरीफ था। बिरजू के पास लाला नाम का एक बंदर था। उसी बंदर के जरिये बिरजू अपना पेट पालता था। बंदर को उसने कई तरह के कर्तब करने के लिए प्रशिक्षित किया था। लोगों का मनोरंजन करने के बदले लोग पैसे देते जो एक थैली के जरिये बंदर जमा करता। जमा करने के बाद वह थैली अपने मालिक यानि बिरजू के पास लाकर देता।

बिरजू एक दिन बंदर लाला के साथ चिड़िया घर चला गया। वहाँ बिरजू के बंदर लाला ने दूसरे और एक बंदर को पिंजरे में बंद देखा। सैंकड़ो लोग उसे देखने के लिए आये थे, और वे उस बंदर को ख़ुशी से बिस्किट्स तथा स्वादिष्ट फल खाने को दे रहे थे।

बिरजू के बंदर लाला को उस पिंजरेवाले बंदर से ईर्ष्या होने लगी। उसने सोचा यह बंदर कि किस्मत कितनी अच्छी है। उसको बिना कुछ किये कितने आसानी से खाना-पीना मिल रहा है।

उस रात बंदर लाला ने भी चिड़िया घर भागने का सोचा, और वह मालिक कि नजर से बच कर भाग निकला। बिरजू कि नजर चुरा कर वह बंदर चिड़िया घर पहुँचा। वहाँ अब उसे भी मुफ्त और बिना मेहनत के खाना मिलने लगा। पिंजरे में बंद आराम का जीवन कुछ दिन बंदर लाला को अच्छा भी।

लेकिन कुछ दिनों पश्चात उसे, अपने मालिक के साथ रहने पर मिलने वाली आज़ादी की याद आयी। वही स्वतंत्र जीवन अब उसे फिर से चाहिए था।
अब उसने वापस से चिड़िया घर से भागने की योजना बनायीं। बड़ी कठिनाई से बंदर लाला वहाँ से भागने में कामयाब हुआ। उसने मालिक के पास जा के वापस से कसरत करना शुरू किया। अब बंदर स्वतंत्रता का क्या मोल होता है, यह बहुत अच्छे से समझ आ गया।

सिख: बिना आज़ादी का विलासी जीवन किसी को भी निकम्मा बना सकता है। स्वतंत्रता अनमोल होती है, इसलिए, यदि मेहनत भरा आज़ाद जीवन और आश्रित विलासी जीवन में से चुनना पड़े तो मेहनत भरा आज़ाद जीवन चुनने में ही समझदारी है।

चमत्कारी गुफा:

एक बड़े से जंगल कि एक गुफा में एक शेरू नाम का भेड़िया रहता था। वह हर दिन सुबह खाने कि तलाश में बहार निकालता और भोजन जुटाने पर रात तक वापस आ जाता। उसी जंगल में एक खतरनाक शेर भी था। वह शेर एक दिन शिकार के पीछे भागते-भागते शेरू भेड़िये के गुफा के नज़दीक आ पहुँचा। तब शेर ने अनुमान लगाया कि इस गुफा में अवश्य ही किसी जानवर का वास होगा। उसने सोचा चलो शाम भी होने को है, तो इसी गुफा में रहकर देखते है। यह सोचकर वह शेर गुफा के अंदर चला गया।

कुछ ही समय में शाम हो गयी और उस गुफा के पास शेरू भेड़िया आ पहुँचा। गुफा के द्वार के पास शेरू भेड़िये ने किसी जानवर के पैरों के निशान अंदर जाते देखें। और वह निशान अंदर तो जा रहे थे, लेकिन बाहर आने के कोई निशान नहीं दिखाई दे रहे थे। इसलिए, शेरू ने अंदर कोई जानवर है या नहीं यह जाँचने के लिए यह युक्ति लगाई।

शेरुने गुफा कि और चिल्लाते हुए कहा, “हे चमत्कारी गुफा, मुझे अंदर जाने की अनुमति प्रदान करें।”
उसके बाद कुछ देर चुप रहने के बाद, फिर से शेरू भेड़िया बोला, “हे मेरी प्यारी गुफा, रोज तो तुम मुझे कितने प्यार से अंदर आने की अनुमति देती हो, लेकिन आज क्या बात है, तुम मुझसे बात ही नहीं कर रही।”

तब उस गफा के अंदर छुपे शेर को सच में लगा कि, “यह गुफा शायद सच में रोज इस भेड़िये से बात करती होगी, तोह क्यों न में ही अंदर आने के लिए कह दूँ। वैसे भी उसे थोड़ी न पता है, कि गुफा के अंदर में छुपा हूँ। और दूसरी तरफ तेज़ भूख भी तो लगी है।”

यह सोचकर अंदर छुपा शेर, “तुम अंदर आ सकते हो।” यह कह दिया। यह बोलते समय शेर के मुँह से अनजाने से बहुत बड़ी गर्जना हुई। जिसके कारन गुफा के आसपास के सभी जानवर भाग गए।
तब शेरू भेड़िया बोला, “शेर महाशय, गुफा भी कभी बोलती है भला?”

यह कहकर शेरू भेड़िया वहाँ से भाग निकला। शेर ने बाहर आके देखा तो सारे जानवर वहाँ से भाग गए थे। और इस तरह बड़ी चतुराई से भेड़िये ने अपने प्राण बचाये।

सिख: यदि आप संयमी और विवेकाधीन नहीं हो तो बना बनाया कार्य भी बिगड़ सकता है।

स्वर्गवासी बिल्ली:

एक शालू नाम कि बिल्ली का अकाल मृत्यु हो जाता है। जिसके कारण बिल्ली का स्वर्ग वास होता है। वह शालू नामक बिल्ली स्वर्ग में पहुँची। तब ईश्वर के दूतों ने उसका बहुत अच्छे से स्वागत किया।

ईश्वर के सामने आने पर ईश्वर बोले, “बोलो तुम्हारी कोई इच्छा हो तो बोलो, तुहारी कोई भी एक इच्छा को में पूरा करूँगा।”

बिल्ली ने कहा, “मुझे ज्यादा कुछ नहीं, बस एक पलंग चाहिए, जहाँ किसी भी प्रकार का व्यत्यय ना आये।”

ईश्वर ने उस बिल्ली की इच्छा स्वीकार करते हुए, आयुष्यमान भव: का आशीर्वाद दिया।

कुछ दिनों पश्च्यात धरती से एक शाल्व नाम का चूहा मर गया। स्वर्ग में पहुँचने पर ईश्वर ने उस चूहे को भी कोई एक इच्छा प्रकट करने को कहा।

शाल्व चूहे ने पहियों वाले जूतों की मांग ईश्वर से कि, जो तेज़ गति से यहाँ- वहाँ आ जा सके। शाल्व चूहे की इच्छा भी ईश्वर ने तुरंत पूरी कि। दोनों की इच्छा पूरी करने के कुछ दिनों पश्चात ईश्वर ने खुद बिल्ली को बुलाके पूछा, “तुम्हें स्वर्ग में कैसा लग रहा है?”

तब बिल्ली बोली, बहुत ही बढ़िया लगा। और सबसे अच्छी लगी आपके यहाँ कि पहियों पर बनायीं भोजन व्यवस्था।

सिख: प्रकृति के नियम बदले नहीं जा सकते, इसलिए अच्छा रहेगा कि, खुद को प्रकृति के अनुसार बदला जाए।

जीवन के पहलू:

भारत के समृद्धि राज्य गुजरात में रामदास नाम का एक व्यापारी रहता था। वह पूजा-पाठ इनके साथ-साथ व्यापर का कारोबार भी अच्छेसे सँभालते थे। उनकी रोज की दिनचर्या में वह सुबह स्नान के बाद भगवान का भजन करते थे। उसके बाद रोज समय पर दुकान खोलते थे। उन्होंने अपनी मेहनत से पैसा और समाज में इज्जत भी कमाई थी। रामदास के चारो तरफ ईमानदारी के चर्चे थे| बढे होने के बाद, उनसे काम करना मुश्किल होने लगा। तब उनके बेटो ने उनके व्यापार में मदत करना शुरू किया। अब रामदास की आयु ६० साल हो गयी थी।

रामदास ने मन में सोचा की, शायद अब मुझे सारा समय ईश्वर की आराधना और जनसेवा करने में व्यतीत करना चाहिए। लेकिन दूसरी तरफ, उनका मन उनसे कहता की, नहीं अभी तो नाती-पोतों के साथ खेलना है, उनको पढ़ाकर उन्हें बड़ा होते देखना है। उनका विवाह भी तो करना हैं। यह सब होने के बाद ही दुकान का त्याग करना सही रहेगा।

इसी बात को सोचते-सोचते रामदास सबेरे टहलने जा रहे थे। ठीक उसी समय सफाई कर्मचारी महिला सड़क पर झाडू लगा रही थी। रामदासजी को सड़क पर चलते देख वह महिला बोली, “सेठजी, कृपाकर आप एक तरफ हो जाईये। बीचमे रहेंगे तो आपके ऊपर धूल पडने के कारण, कपडे ख़राब हो जाएंगे। एक तरफ रहेंगे तो धूल से सुरक्षित रहेंगे।”

सफाई कर्मचारी महिला की उन बातों ने सेठजी की आँखे खोल दी। वो समझ गए की, जीवन में सांसारिक और आध्यात्मिक ये दो अलग-अलग रस्ते होते हैं। इन दोनों रास्तों एकसाथ चलना असंभव हैं। उन्होंने उसी समय घर जाकर दुकान की चाबी अपने बेटो को देते हुए कहा: “बेटो, मैंने जीवन में अब तक का समय धन कमाने में बिताया हैं। लेकिन अब, में शेष जीवन ईश्वर की भक्ति के साथ, मेरे कमाए धन से जनसेवा करने में व्यतीत करना चाहता हूँ।”

यह बात सुनकर सभी बेटो और अन्य परिवारजनों को बड़ा दुख हुआ। लेकिन रामदासजी की इच्छा का मान रखते हुए उनके परिवारजनों ने उनको सभी दायित्वों से मुक्त कर दिया। अब रामदास पूरी श्रद्धा से भक्ति और जनसेवा में डुबे रहे। कुछ समय पछ्यात रामदासजी को लोग “भगत रामदास” के नाम से जानने लगे।

सिख: दो नावों में सवार होनेवाले व्यक्ति का कभी कल्याण नहीं होता।

सत्य का फल:

एक बार प्रयाग नगर के राजा प्रतापरुद्र के मन में एक विचार आया वह जानना चाहते थे, की लोगो को किसी अपराध के कारण दंड देने के पश्च्यात क्या उनके मन में कोई पश्च्याताप की भावना आती भी है या नहीं। दूसरे दिन राजा प्रतापरुद्र अपने राज्य के कारावास पहुँच गए| राजा सभी कैदियों को एक के बाद एक पूछने लगे, की उन्होंने कौसी वजह से अपराध को अंजाम दिया।

एक बंदी बोला: “महाराज! मैंने कोई भी अपराध नहीं किया। मैं निरपराध हूँ, मैंने कोई गुनाह नहीं किया।”

दूसरा कैदी बोला: “राजन! मुझे इस अपराध में किसीने फसाया हैं। मैंने कोई गुनाह नहीं किया, मैं निर्दोष हूँ।”

इसी तरह बाकि बचे सभी करावासी भी खुदको निर्दोष बताने लगे। फिर राजा प्रतापरुद्रने देखा की एक व्यक्ति निचे बैठकर रो रहा था।
राजा द्वारा पूछने पर उस ने बड़ी विनम्रता के साथ कहा: “महाराज! मैंने गरीबी से परेशान होकर चोरी की थी| मुझे आपके न्याय प्रणाली पर पूरा भरोसा हैं। मैंने जुर्म किया था, जिसकी सजा मुझे मिली।”

राजा प्रतापरुद्र को अपने प्रश्न का उत्तर मिल गया था। उन्होंने मन में कहा की, “दंड का विधान सभी अपराधियों के अंदर पश्च्याताप का भाव पैदा नहीं करता। लेकिन उन सभी कैदियों के बीच यही ऐसा हैं, जिसमें अपराध करने का दुःख था, और पश्च्याताप की भावना भी थी।”
उसी व्यक्तिने उस कारावास में अपने जुर्म का प्रायश्चित्त पूरा किया था।

राजा आगे बोले, “की, यदि इस व्यक्ति को बंदीगृह से मुक्त किया जाता है, तो अवश्य ही अपने अंदर सुधर कर सकता हैं।”
इसलिए राजा प्रतापरुद्रने उस व्यक्ति को कैदखाने से मुक्त किया।

सिख: कभी विपरीत परिस्तिती में भी सच का साथ नहीं छोड़ना चाहिए।

पढ़िए काल्पनिक कहानी आखिर कैसे हुई जूतों कि खोज

I hope you liked the moral stories in Hindi language. If so please don’t forget to share these stories with your friends. So they can also take learning from the moral stories.

Leave a Comment

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Encourage us by sharing over social media!

Social sharing encourage us to produce more quality content. So, share over at least one social platform and one good thing is it's totally FREE!
I don't believe in appreciation
Send this to a friend