Akbar Birbal stories in Hindi with moral

Hi guys, today I am going to share Akbar Birbal stories in Hindi. So let’s get started,

Akbar Birbal stories in Hindi with moral:

आधा हिस्सा:

एक बार बिरबल बड़ी जल्दी में बादशाह अकबर के मनोरंजन करने हेतू सुबह- सुबह राज महल जा रहे थे। तभी महल के बहार द्वार पाल ने उन्हें रोक लिया। वह द्वार पाल नया-नया नियुक्त हुआ था। इसलिए बिरबल दरबार के नव रत्न दरबार में शामिल है, यह बात द्वार पाल नहीं जनता था। बिरबल ने सबकुछ बताने पर भी वह द्वार पाल उन्हें अंदर जाने नहीं दे रहा था।

तब बिरबल ने अंदर जाने के लिए युक्ति का प्रयोग किया। बिरबल ने द्वार पाल के नज़दीक जा के धीरे से कहा, “सुनो, अगर मुझे तुम अंदर जाने दोगे, तो में तुम्हें मुझे जो भी मिलेगा उसमें से आधा हिस्सा तुम्हें दे दूँगा।”

इस बात पर द्वार पाल राजी हो गया और बिरबल को अंदर जाने दिया।

मनोरंजन के लिए गए बिरबल ने बहुत कुछ सुनाकर बादशाह का दिल खुश किया। तब बादशाह ने बीरबल से कहा, “माँगो, बिरबल जो भी चाहिए माँगो, आज आपने हमें बहुत खुश किया है।”

तब बिरबल बादशाह से बोले, “सरकार मेरी आपसे एक ही गुज़ारिश है की, मुझे सौ कौड़े लगाए जाए।”

बिरबल की ऐसी विचित्र माँग सुनकर बादशाह हैरत में पड़ गए। लेकिन आख़िरकार बादशाह को बिरबल की माँग तो पूरी करनी ही थी। इसलिए, बादशाह अकबर ने आदेश दिया कि, “बिरबल को सौ कौडे मारे जाए।”

कुछ ही देर में एक सिपाही आसुड ले के हाज़िर हुआ।

अब सिपाही बिरबल को कौड़े मारना शुरू ही करने वाला था, तभी बिरबल बोले, “अरे रुको! मैं अपने हिस्सेदार को तो भूल ही गया। मैंने जो सौ कौड़े माँगे हैं, उसमें से आधे का हिस्सेदार महल के बाहर खड़ा द्वार पाल है।”

बादशाह ने तुरंत महल के द्वार पाल को बुलाने का आदेश दिया।

कुछ ही समय में द्वार पाल आया, वह बहुत खुश था। उसे लगा पता नहीं बादशाह कौन सा पुरस्कार में हिस्सा देंगे।

अब बिरबल बोला, “यही है मेरे माँगे हुए सौ कौडों में से आधे कौडों का हिस्सेदार।”

बिरबल के बताने पर सिपाही उसकी और बढ़ने लगा। अब मानों द्वार पाल के पैरों तले ज़मीन खिसक गयी।

फिर बिरबलने बाहर हुई पूरी घटना बादशाह को विस्तार से बताई।

सिपाही बिरबल और बादशाह के सामने बोला, “माँफी सरकार माँफी, आख़िरी बार मुझे माँफ करें दोबारा ऐसी गलती नहीं होगी।”

द्वार पाल को काम के समय की गयी गलती का अहसास हुआ। तब बिरबलद्वारा समझने पर बादशाह ने भी द्वार पाल को माँफ किया।

सिख: कभी भी लालच में आकर अपने कर्तव्य के साथ सौदा नहीं करना चाहिए।

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बूंदसे गयी वो हौदसे नहीं:

एक दिन अकबर बादशाह के जन्मदिन के अवसर पर उत्सव का आयोजन किया था। उत्सव के बाद कुछ धार्मिक अनुष्ठान हुए जिसके बाद बादशाह सभी को पर नए वस्र और हाथों पर सुगंधित इत्र लगा रहे थे।

दरबारियों को इत्र लगते समय एक बार बादशाह के हाथों से एक बूंद इत्र निचे चादर पर गिर जाता है। बादशाह तेज़ी से वह इत्र का बूंद हाथ की अंगुली से लेने का प्रयास किया लेकिन उससे पहले ही वह बूंद चादर के अंदर सोख गया।

हिंदुस्तान के इतने बड़े बादशाह का इत्र के एक बूंद के लिए झटपटाते देखकर सभी दरबारियों को अजीब लगा। कोई भी कुछ बोला नहीं लेकिन चेहरों के भाव सब कुछ कह गए। इन्ही दरबारियों में बिरबल भी शामिल था। अकबर बादशाह को भी दरबारियों के चेहरे देख उनके मन में जो चल रहा था, सबकुछ पता चल गया।

बादशाह को भी उन्होंने जो किया उसके लिए अजीब सा महसूस हो रहा था।

दूसरे दिन बादशाह अकबर ने ढिंढोरा पिटवाया कि, “राज महल के हौद में इत्र डाला हुआ है। जिसको जितना मर्जी चाहे इत्र ले जा सकता है।”

कुछ देर में बिरबल राज महल आता है। तब वह देखता है कि सभी लोग बादशाह की जयजयकार करते हुए बड़े-बड़े बर्तन भरकर इत्र ले जा रहे है।

कुछ समय में बादशाह उसी आया, बिरबल को देखते ही बोला, “क्यों बिरबल, कैसा लग रहा है, मजा तो आ रहा है ना!”

बिरबल बादशाह के थोड़ा नजदीक जाकर बोला, “सरकार, जो बूंदसे गयी, वो हौद से वापस नहीं आएगी।”

सिख: एक बूंदसे से गयी इज्जत हौद भर इत्र से वापस नहीं आती।

लालची साधू:

जमुनाबाई नाम कि एक लोगों के खेतों में काम करके गुजरा करती थी। उतरती आयू के लिए उसने हर महीने थोड़ा धन अलग से रखा था। एक समय आया जब जमुनाबाई कि आयु हो गयी।

कुछ ही दिनों में पास वाले दंपति जोड़ा तीर्थयात्रा के लिए जाने वाले था। इसलिए, जोडे में से पत्नी ने जमुनाबाई से पूछा कि, “जमुनाबाई, हम अगले हफ्ते तीर्थयात्रा के लिए निकलने वाले है, क्या आप भी साथ में चलोगे।”

जमुनाबाई ने सोचा कि मेरी वैसे भी आयू होने को है। ज्यादा उम्र होने पर वैसे भी खुद से जाना नहीं। इसलिए क्यों न अभी चली जाऊँ।

दूसरे दिन जमुनाबाई ने अपनी पड़ोसन को बताया, “ठीक है में भी साथ में भी तीर्थगमन के लिए आना चाहूँगी। आप की वजह से मेरी भी तीर्थयात्रा होगी।”

जमुनाबाई ने तीर्थगमन के लिए जाने की सारी तैयारी कर ली थी। लेकिन जमुनाबाई अपनी जिंदगी भर की सारी कमाई साथ में तो नहीं ले जा सकती थी। इसलिए, जमुनाबाई ने जमापूंजी किसी विश्वसनीय व्यक्ति के पास देने की सोची। लेकिन ऐसा कोई व्यक्ति जमुनाबाई को नहीं मिला जिसके पास सारा धन वो रख सके। कुछ महीनों पहले जमुनाबाई में गाँव एक साधु आया था। कोई भी उसके कुटियाँ में जाता वह ईश्वर चिंतन करता दिखाई देता। इसलिए जमुनाबाई को लगा कि इस साधु जी के पास धन रखना ही सही रहेगा। वैसे भी एक साधु को धन में क्या रूचि होगी।

आखिरकार जमुनाबाई उस साधु के कुटियाँ में गयी और साधु से कहा, “स्वामी में तीर्थयात्रा करने जा रही हूँ। मैंने दिन-रात एक करके जो धन बुढ़ापे के लिए रखा है, वह आप ही के पास महफ़ूज़ रह सकता है। तीर्थयात्रा करके वापस आने पर में वापस ले लुँगी।”

तब साधु बोला कि, “मुझे सांसारिक चीजों में क्यों उलझा रही हो। हमने तो सालों पहले मोहमाया छोड़ दी है। हमारे लिए मिट्टी और सोना एक ही है।”

साधु कि बाते सुनकर जमुनाबाई का साधु पर विश्वास और बढ़ गया। अब उसने बिना किसी संकोच के अपनी जमापूंजी उस साधु के पास ही रखने का निर्णय किया।

फिर साधु बोले ठीक है अगर इतना ही कह रही हो तो। तुम्हारा धन तुम खुद ही कुटियाँ के अंदर उस कोने में ज़मीन के अंदर गट्ढा करके उसे अंदर दफ़न कर दो।

साधु पर विश्वास रख कर जमुनाबाई तीर्थयात्रा के लिए निकल गयी और छे साथ महीने बाद वापस आ गयी।

वापस लौटने पर जमुनाबाई ने अपने पड़ोसियों का धन्यवाद किया और कहा, “आपके वजह से मेरी भी तीर्थयात्रा हो गयी, इसलिए तहे दिल से धन्यवाद!”

जमुनाबाई अपनी जमा पूँजी साधु से वापस लेने गयी और साधु से कहा, “स्वामी कृपा कर मेरी जमा पूँजी मुझे वापस करें।”

तब साधु बोला, “मुझे तुम्हारे धन से क्या नाता, तुमने जहॉं गाड़ा था, वही से वापस ले जाओ।”

गंगाबाई ने जहाँ धन गाड़ा था वहाँ जाके देखा तो, उसने पाया कि, उसकी जमापूंजी नियत जगह पर नहीं थी।

तब गंगाबाई चिल्लाई, “हे भगवान! मेरी उम्र भर की जमा पूँजी कहा गयी?”

उसने कई जगह पर गड्ढ़े करके देखा पर उसकी जमा पूँजी उसे नहीं मिली।

जमुनाबाईने उस साधु से पूछा, “स्वामी मेरी जीवन भर की मेहनत कहा गयी?”

तब साधु बोला, “देखो में तो ईश्वर का पुजारी हूँ, मैंने तुम्हारे धन को देखा तक नहीं था। इसलिए मुझे पूछ के अपना समय मत बर्बाद करो। और मेरे ध्यान में बाधा मत बनों।”

जमुनाबाई रोते हुए घर आती है। अब उसे समझ नहीं आ रहा था की, न्याय माँगे तो किससे? उसे रोता हुए घर आते देख उसकी पड़ोसन उसे उसकी परेशानी पूछने आती है। तब जमुनाबाई ने अपनी व्यथा पड़ोसन को सुनाई। तब पड़ोसन ने उसे बिरबल के यहाँ जाने की सलाह दी। पड़ोसन के कहने पर जमुनाबाई बिरबल के यहाँ जाके अपनी व्यथा सुनाती है।

बिरबल ने दूसरे दिन गहनों से भरा संदूक एक अतिविश्वसनीय सेवक के पास दिया। बिरबल उस सेवक को बोला, “यह संदूक उस साधु के यहाँ ले जाकर मेरे बताए मुताबिक नाटक करना, ठीक है?”

बिरबल के कहने के मुताबिक वह सेवक साधु के यहाँ चला गया।

वहा जा के वह साधु से बोला, “स्वामी कुछ दिनों से मेरा भाई परदेस गया है। ये गहने मेरे पत्नी के है, में कुछ दिन बाहर व्यापार के लिए जा रहा हूँ, घर पे मेरी पत्नी अकेली रहेगी है तो चोरी ना हो इसलिए यह गहने में आपके यहाँ रखने आया हूँ।”

साधु बोला, “मेरा रिश्ता तो सिर्फ परमेश्वर से है। इसलिए, मुझे ये विष मत दो।”

सेवक बोला, “स्वामी इसलिए तो मेरा आप पे भरोसा है।”

तब साधु बोला, “ठीक है, जैसी तुम्हारी मर्जी।”

उसी समय बिरबल ने बताए मुताबिक जमुनाबाई वहाँ आ पहुँची। और साधु से कहने लगी, “स्वामी मुझ जैसे गरीब को मत धोखा दे। मेरी जमा पूँजी मुझे वापस करें।”

वह जेवरों से भरा संदूक लेके आया व्यापारी हाथ से निकल न जाए, इस डर से साधु ने जमुनाबाई से कहा, “तुमने अपनी जमा पूँजी दरवाज़े के पास वाले कोने में रखी थी और तुमने देखा किसी कोने में, तो तुम्हें अपना धन कैसे मिलेगा? जाओ और दरवाज़े के पास वाले कोने में देखो।”

जमुनाबाई ने साधु द्वारा बताये स्थान पर खुदाई करने पर उसे अपनी धन से भरी थैली मिल जाती है।

थैली मिलने पर बिरबल के योजना के मुताबिक वहाँ तुरंत दूसरा सेवक आकर कहता है, “हे मेरे भाई कैसे हो, रस्ते में भाभीजी मिली थी उन्होंने बताया की आप उनके गहने लेके यहाँ आये हो। लेकिन अब में आ गया हूँ तो तुम्हें गहनों की फ़िक्र करने की कोई जरुरत नहीं।”

पहला सेवक बोलता है, “ठीक है! अब तुम आ गए हो तो मुझे गहने कहीं और जगह रखने की क्या जरुरत? धन्यवाद स्वामी में चलता हूँ।”

सेवक गहने वापस लेके जाते है, दूसरी और जमुनाबाई के गहने भी मिल गए। बिरबल कि युक्ति से साधु का लालच भी सबके सामने आया।

सिख: किसी की बातों और पहनावे को देखकर किसी अजनबी के ऊपर हद से ज्यादा विश्वास नहीं करना चाहिए।

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हटी बालक:

बिरबल हमेशा समय रहते दरबार पहुँचा करता था। समय के पालन में वह कोई कसर नहीं छोड़ता था। लेकिन एक दिन उसे आने में थोड़ी सी देरी हो गयी। तब बादशाह ने बिरबल से पूछा कि, “क्या हुआ बिरबल? जो बिरबल समय के हिसाब से चलता था, उसे आज आने में देरी क्यों हो गयी?”

बिरबल बोला, “अब क्या बताऊ सरकार? मेरे बच्चों ने जिद पकड़ ली की में दरबार ना जाऊँ।”

तो उनको समझाते-समझाते देरी हो गयी।

बादशाह बोला कि, “बिरबल कुछ भी कारण मत बताओ. अगर बताना ही था तो असली कारण बताते।”

फिर बिरबल बोला, “सरकार, बच्चों को डाँटना, चिल्लाना, उनको दंड देना बहुत आसान होता है। लेकिन उन पर बिना चिल्लाये उन्हें शांत करना, समझाना बहुत कठीण कार्य होता है।”

बादशाह हँसते हुए बोला कि, ”देखो बिरबल, बताना है तो कुछ अलग कारण बताओ, बच्चों को बिच में ना लाओ। बच्चे तो बड़े प्यारे होते है। वो भला तुम्हारे आने में क्यों बाधा बनेंगे।”

बिरबल बोला, “नहीं सरकार, में सत्य बोल रहा हूँ।”

तब अकबर बोला, “अगर ऐसा है, मेरे सामने किसी भी बच्चे को लाओ, और में उसे चुप करके साबित कर दूँगा कि बच्चों को मनाना बहुत ही आसान काम है।”

बिरबल बोला, “ठीक है। लेकिन किसी बच्चे को लाकर समय नष्ट करने से अच्छा है में खुद ही बच्चा बन जाऊँ।”

बादशाह भी राजी हो गया। फिर बिरबल बोला, “सरकार में आपके सामने एक छोटा बच्चा. लेकिन शर्त ये है की आप उसपर गुस्सा नहीं करेंगे, या दंड करूँगा ऐसा भी नहीं कहेंगे।”

बादशाह बोला, “हाँ-हाँ ठीक है, उसमे क्या मुश्किल है?”

बिरबल बोला, “हाँ, तो अब से में आपका पुत्र और आप मेरे पिताश्री। अब मनाइये मुझको।”

अब बिरबल छोटे बच्चों कि तरह दरबारिओं के साथ शैतानियाँ करने लगा। दरबारिओं के मूछों के साथ, उनके अलंकार, पगड़ी निकालकर उसके साथ खेलने लगा। सभी दरबारी बिरबल कि शैतानियों से तंग आ गए थे लेकिन वो कर भी क्या सकते थे बादशाह का चुप रहने का आदेश जो था।

उसके बाद बिरबल सीधा बादशाह के यहाँ गया। बादशाह उसको मनाने के लिए बोला, “अरेरे, क्या कर रहे हो! अच्छे बच्चे ऐसा नहीं करते।”

अब तो बादशाह कि बात सुनकर बिरबल ज़मीन पर जोर से बैठकर जोर-जोर से रोने लगा। इसलिए बादशाह उसके पास गया और उससे कहा, “मेरे बेटे को क्या चाहिए?”

बादशाह ने सेवक से कहा, “सुनो मेरे प्यारे बेटे के लिए दुनियाँ भर के मशहूर पकवान लाना।”

बिरबल के सामने पकवान आने पर वह पकवानों कि थाली उड़ा देता है। बादशाह भी उसके कारनामों से परेशान होने लगा था। अब बादशाह सोचने लगा कि अब इसको कैसे मनाए। सोचने पर बादशाह को लगा अगर इसकी मनपसंद चीज अगर उसे मिल जाय तो शायद वो मान जाय।

यह सोचकर बादशाह ने बिरबल से पूछा, “मेरे बच्चे को क्या चाहिए, नए कपड़े या बहुत सारे खिलौने ला दूँ?”

तब बिरबल बोला, “मुझे बहुत बड़ा हाथी पे बैठना है।”

बादशाह बोला, “हां क्यों नहीं, मेरा राजा बेटा अब दिल्ली के सबसे बड़े हाथी पर बैठेगा।”

बिरबल को हाथी पर बिठाने के लिए बादशाह और बिरबल दोनों राज महल के बाहर आ गए। माँग के मुताबिक बिरबल को माहुत हाँथी पर बिठाने लगा।

लेकिन बीरबल बोला, “मुझे और कोई नहीं सिर्फ पिताश्री हाँथी पर बिठायेंगे।”

बादशाह ने बिरबल को चुप कराने के लिए खुद बिरबल को हाथी पर बिठाया। अब बादशाह अकबर को लगा कि अब बिरबल शांत हो जायेगा।

लेकिन उस हाथी से उतरते ही वह बोला अब मुझे सबसे छोटे हाथी पर बैठना है।

बादशाह अकबर ने फिर से सेवक से कुछ महीनों पहले जन्मे हाथी को लाने के लिए कहा। कुछ समय पश्चात एक दूसरा माहुत छोटे हाथी के साथ वहाँ हाज़िर हुआ।

बादशाह बोला, “ये लो आ गया तुम्हारा सबसे छोटा हाथी। अब तो खुश!”

बिरबल बोला, “मुझे हाथी पर बिठाईये तो सही।”

बादशाह को अंदर से गुस्सा आ रहा था। लेकिन, वह शांत रहने कि कोशिश कर रहा था। बादशाह अकबर ने बिरबल को फिर से उस छोटे हाथी पर बिठाया। उस हाथी से उतरने के बाद बादशाह को लगा, कि अब तो बिरबल शांत हो ही जायेगा।

लेकिन इतना आसान थोड़ी था बिरबल को चुप कराना। वह फिर से रोने लगा और बोला, “मुझे बड़े हाथी पर ही बैठना है।”

बादशाह ने पहले से खड़े हाथी को पास बुलाया।

बादशाह बोला, “ये लो तुम्हारा बड़ा हाथी आ गया चलो में तुम्हें उसके ऊपर बिठाता हूँ।”

तब बिरबल बोला, “नहीं ये नहीं, मुझे छोटा हाथी ही बड़ा करके चाहिए।”

बादशाह अब अपना गुस्सा रोक नहीं पाया। और जोर से बिरबल के ऊपर चिल्लाया, “बेवकूफ़! कुछ भी मत माँगा करो। छोटा हाथी कभी एकदम से बड़ा होता है क्या? अब रोने लगे तो एक खिचके दूँगा।”

अब बिरबल सामान्य आवाज़ में बच्चे के किरदार से बाहर आया।

और बीरबल बोला, “देखिये सरकार, चिल्लाना नहीं है यह तय हुआ था आप को मारने निकले थे।”

अब बादशाह अकबर को, छोटे बच्चे जितने प्यारे लगते है, उनकी शैतानियाँ और कारनामे उतने ही बड़े होते है। यह बात अच्छी समझ आ गयी थी।

तब बादशाह अकबर बोला, “सही में बिरबल, छोटे बच्चों को मनाना और उनका हट पूरा करना, बहुत ही मुश्किल है।”

सिख: जरूरी नहीं जो चीजें बहुत आसान दिखे वो सच में उतनी आसान हो।

सच्चा वृक्षप्रेमी:

हीरा लाल और बिहारी लाल दोनों पड़ोसी थे। दोनों आंगन के आंगन में एक आम का पेड़ था। ग्रीष्म ऋतु में आम के पेड़ को बहुत सारे आम लगे थे। दोनों पड़ोसियों में आम उतारते समय पेड़ के स्वामित्व को लेकर झगड़ा शुरू हुआ।

हीरा लाल बोला, “इस पेड़ कि मैंने न जाने कितने वर्षों से देखभाल कि है।”

बिहारी लाल बोला, “हाँ- हाँ क्यों नहीं, अब कोई भी यही कहेगा। लेकिन, यह पेड़ सिर्फ मेरा है। इसलिए, इस पेड़ से सारे आम सिर्फ में ही निकालूँगा।”

तब रास्ते से जाता एक पहचान वाला आदमी, उन दोनों को बादशाह अकबर के पास न्याय माँगने की सलाह दी।

उस राह चलते व्यक्ति कि बात मानते हुए दोनों राज दरबार पहुँचकर बादशाह के सामने न्याय कि गुहार लगाते है।

बादशाह अकबर उन दोनों का मामला सुलझाने के लिए बिरबल के पास भेज दिया। बिरबल ने दोनों कि शिकायत सुन ली। तब बिरबल ने पूछा कि इस पेड़ कि रक्षा कौन करता है।

तब बिहारी लाल बोला, “सरकार हम दोनों कि तरफ से एक पहरेदार उस पेड़ कि रखवाली करता है।”

बिरबलने उस रखवालदार से पूछा कि, “तुम किसके लिए पेड़ कि रखवाली करते हो।”

रखवालदार बोला, “सरकार में तो एक महीने पहले ही रखवाली करने आया हूँ। और जब मुझे काम पर रखा तब, उन दोनों ने पेड़ के यहाँ नियुक्ति करने के लिए बुलाया था। इसलिए, मुझे पेड़ का सच्चा स्वामी कौन है, वो नहीं पता।”

हीरा लाल और बिहारी लाल दोनों को बिरबल ने घर भेज कर रखवालदार को उस रात एक काम सौपा। पेड़ सच्चा मालिक का पता चलने के लिए पहरेदार वह काम करने के लिए ख़ुशी-ख़ुशी राजी हो गया।

बिरबलने हीरा लाल और बिहारी लाल के घर के पास दो लोगों को छिपने के लिए कहा। दोनों को इसतरह से छिपने के लिए कहा कि उनको अंदर कि बाते सुनाई दे।

बिरबल के कहने के मुताबिक पेड़ का रखवालदार बिहारी लाल के घर गया। कुछ समय पश्चात बिहारी लाल कि पत्नी ने दरवाज़ा खोला।

रखवालदार ने बिहारी लाल कि पत्नी से कहा, “मालिक कहा है?”

बिहारी लाल कि पत्नी बोली, “वह तो अभी सो रहे है, क्या कुछ काम था उनसे?”

रखवालदार बोला, “पेड़ के आम उतारने के लिए लाठियाँ ले के चार- पाँच लोग आए है। में अकेला उनका सामना नहीं कर पाउँगा।”

बिहारी लाल कि पत्नी बोली, “हे भगवान! आप रुकिए, में अभी स्वामी को जगाती हूँ।”

पत्नी ने जाकर अपने पति बिहारी लाल को जगाते हुए कहा, “सुनिए जी, जल्दी उठिये, पेड़ के आम उतरने के लिए चोर आये है।”

तब बिहारी लाल बोला, “क्या मुसीबत है, उस पेड़ के लिए तुमने मुझे नींद से जगाया। चोर आए है तो आने दो, वैसे भी में क्या उन चोरों से सामना करूँगा। और अगर कुछ आम के लिए मेरे प्राण चले गए तो। इसलिए, तुम भी उस पेड़ और आम कि चिंता छोड़ कर सो जाओ और मुझे भी सोने दो।”

बिहारी लाल कि सारी बातें उसके घर के पास छुपे गुप्तचर सुन रहे थे।

बिरबल ने बताए योजना के मुताबिक, पेड़ का पहरेदार अब हीरा लाल के पास पहुँचा। तब देर रात तक काम करके आया हीरा लाल भोजन कर रहा था।

रखवालदार ने दरवाजा खटकाने पर दरवाजा हीरा लाल ने खोला। हीरा लाल ने पूछने पर रखवालदार बोला, “मालिक जल्दी चलिए, पेड़ के आम उतारने के लिए चोर आए है।”

हीरा लाल बोला, “क्या, फिर तुमने उन्हें भगाया क्यों नहीं?”

रखवालदार बोला, “मालिक वह चार- पाँच लोग है। इसलिए, अकेला सामना नहीं कर पाऊंगा।”

उसकी यह बात सुनकर हीरा लाल झट से भाला निकालकर घर से निकलने लगा।

तभी पत्नी ने अपने पति हीरा लाल से पूछा, “सुनिए खाना बीच में छोड़कर कहा जा रहे हो।”

तब हीरा लाल ने जवाब दिया, “पेड़ के आम चुराने के लिए चोर आए है। अगर उनको पकड़ा नहीं तो सारी मेहनत पानी में जाएगी। इसलिए, मुझे आम को चोरों से बचाने के लिए जाना होगा।”

बाहर छुपे गुप्तचरों ने हीरा लाल कि भी सारी बातें सुन ली थी।

हीरा लाल कि पेड़ कि तरफ आते देखकर चारों चोर भाग गए। वो चारों चोर बिरबल के ही भेजे आदमी थे।

जो दो गुप्तहेर घर के पास छिपे थे, दोनों ने हीरा लाल और बिहारी लाल कि बातें बिरबल को बता दी। दोनों कि बातें सुनने के बाद तुरंत बिरबल को असली मालिक का पता चला।

दूसरे दिन दरबार में न्याय होने वाला था, इसलिए हीरा लाल और बिहारी लाल दोनों उपस्थित थे।

बिरबल बोला, “उस आम के पेड़ पर दोनों का अधिकार है। दोनों के स्वामित्व होने कि वजह से दोनों आम आधे-आधे आपस में बाँट लो। उसके बाद बचा पेड़ उसे हमारे सेवक बराबर आधे हिस्सों में तोड़कर उनकी लकडयाँ दोनों में बाँट दी जाएगी। इसतरह से यह मामला हमेशके लिए मिट जाएगा।”

इस न्याय से हीरा लाल को बड़ा दुःख हुआ। वह थोड़े ऊँचे स्वर में बोला, “सरकार पूरा पेड़ और उसके सारे आम अगर बिहारी लाल को दिए तो भी चलेगा। लेकिन कृपा करके उसे तोड़िये मत। वह बहुत सालों से हमारे आँगन में है और उसे किसी ने तोड़ दिया तो में नहीं देख पाऊंगा।”

अब बिरबल बोला, “हीरा लाल ही आम के पेड़ का सच्चा मालिक है। उसको पेड़ो से बहुत लगाव है। इसलिए, कल रात जब चोर आने कि खबर मिली तब वह तुरंत पेड़ कि और भागा चला आया। उसके साथ पेड़ को काटने की बात भी उसे मंज़ूर नहीं। क्योंकि, उसने उस पेड़ को बचपन से बड़ी मेहनत से बढ़ाया है।”
बीरबलने आगे बिहारी लाल से कहा, “बिहारी लाल तुम बहुत बड़े झूठे किस्म के आदमी हो। तुम्हे तो दंड मिलना ही चाहिए।”

तब बिहारी लाल ने हाथ जोड़कर बिरबल से कहा, “सरकार मुझे क्षमा करें, मुझसे आम मिलने के लालच से गलती हो गयी। हीरा लाल ही उस पेड़ का अधिकारी है और उसी ने पेड़ को बचपन से पानी और खाद डालकर बड़ा किया है।”

हीरा लाल बोला, “नहीं सरकार, बिहारी लाल को दंड मत दीजिए। वह मेरा पड़ोसी होने के नाते उसको भी आम दे दूँगा।”

हीरा लाल कि बात को मानते हुए बिरबल ने बिहारी लाल को छोड़ दिया। और दोनों साथ में मिलजुलकर खुशी से रहने लगे।

इस प्रकार, बिरबल ने बड़ी चतुराई से इस जटिल मामले को सुलझाया।

सिख: कभी भी दूसरों कि मेहनत पे अपना हक़ नहीं जताना चाहिए।

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पेड़ कि गवाही:

एक छोटे से कंदपुरा नाम के गांव में शामराव नाम का एक गरीब किसान रहता था। वह अपनी खेती करके और दूसरों के खेतों में काम करके अपना गुजरा करता था। उसने जीवन भर बड़ी मेहनत से एक-एक मुद्रा जोड़कर बुढ़ापे में काम आ सके इसलिए धन बचा के रखा था।

शामराव की पत्नी गुजर चुकी ची और पत्नी के अलावा शालिनी नाम कि एक बेटी थी। शालिनी विवाह के पश्चात अपने ससुराल चले जाने के बाद शामराव घर में एकेले ही वास करते थे। एक बार शामराव बेटी के यहाँ जाने के लिए निकला। तब उसने सारा धन उनके गाँव में रहनेवाले सर्जेराव के बेटे मुरारीलाल के पास रखने का सोचा।

उसके घर जाते समय बीच रास्ते में ही उनको मुरारीलाल मिलता है। तब शामराव मुरारीलाल को रोकते हुए हालचाल पूछते हुए बोले, “क्या मुरारीलाल कैसे हो?”

मुरारीलाल बोला, “बस कुछ काम से बाहर जा रहा हूँ।”

शामराव बोले, “में अभी आप ही के यहाँ निकला था। क्या कुछ देर इस पीपल के पेड़ के यहाँ रुक्के बात कर सकते है?”

मुरारीलाल बोला, “हाँ-हाँ, क्यों नहीं?”

दोनों पीपल के पेड़ के नीचे बनाए चबूतरे पर बैठ गए।

कुछ देर इधर-उधर कि बातें करने के बाद, शामराव बोले, “मेरा तुमसे बहुत ही महत्वपूर्ण काम है। मेरा तुम पे पूरा भरोसा है इसलिए में सिर्फ तुम्हें यह बात बता रहा हूँ।”

मुरारीलाल बोला, “चाचाजी आप कौन सी भी बात मुझसे बेझिजक कर सकते है, में आपको निराश नहीं करूँगा। वैसे भी मैंने अभी तक कौन से भी चीज के लिए मना किया है भला। ”

मुरारीलाल कि बातें सुनकर शामराव का मुरारीलाल पर भरोसा और मजबूत हो गया।

अब शामराव बोले, “में कल कुछ दिनों के लिए मेरी बेटी शालिनी के यहाँ जा रहा हूँ। मैंने मेरे शेष जीवन के लिए कुछ धन बचा के रखा था। लेकिन मेरे घर में मेरे अलावा तो कोई है नहीं। अब में भी बेटी के ससुराल जाऊँगा तब, वह धन में घर में तो नहीं रख सकता। इसलिए मैंने सोचा कि किसी पास वाले भरौसेवाले व्यक्ति के पास ही धन को रखना चाहिए।”

शामराव ने मुहरों से भरी थैली निकालकर मुरारीलाल के हाथ सौंप दी।

थैली लेकर मुरारीलाल बोला, “चाचाजी आप धन कि बिलकुल चिंता ना करे। में आपकी जमा पूँजी एकदम सुरक्षित रखूँगा।”

शामराव दूसरे दिन एकदम निश्चिंत होकर बेटी के यहाँ जाने के लिए निकले।

साढ़े-चार महीनों बाद शामराव वापस आपने गाँव कंदपुरा लौटे।

गाँव में लौटने के दूसरे दिन शामराव मुरारीलाल के घर गए। दरवाज़ा कि कुण्डी खटकाने पर मुरारीलाल ने दरवाज़ा खोला। मुरारीलाल बोला, “चाचाजी आज बहुत दिनों बाद, अंदर तो आइए।”

मुरारीलाल ने शामराव को अंदर बुलाया और, पानी पिलाया।

मुरारीलाल बोला, “कहीये चाचाजी कैसे आना हुआ?”

अब शामराव बोले, “में कल ही बेटी शालिनी के घर से लौटा हूँ। तो सोचा आज तुम्हारे पास सौपा धन तुमसे वापस ले लूँ। मेरी मुहरें सुरक्षित तो रखी थी ना!”

मुरारीलाल बोला, “चाचा मुहरें? किसकी मुहरें? कैसी मुहरें?”

शामराव को लगा शायद भूल गया होगा, इसलिए शामराव ने मुरारीलाल को याद दिलाने कि कोशिश की।

फिर भी याद नहीं आने पर शामराव बोले, “अरे मैंने तुम को यात्रा को निकलने से पहले दी थी।”

मुरारीलाल बोला, “कब और कहाँ, चाचाजी आप किस मुहरों कि बातें कर रहे हो। मुझे तो कुछ समझ नहीं आ रहा। आप थोड़े थके लग रहे है, आप पानी पीकर थोड़ा आराम करें।”

अब शामराव को मुरारीलाल बोले, “मुझे पानी नहीं चाहिए, मुझे मेरे मुहरें दे दो ताकि में यहाँ से जा पाऊँ।”

तब मुरारीलाल बोला, “मेरे पास कोई मुहरें नहीं है। में कुछ नहीं देनेवाला आप यहाँ से निकल जाओ और दुबारा कुछ माँगना हो तो मेरे घर का दरवाज़ा मत खटकाना।”

शामराव बड़ा दुखी होकर घर लौटा लेकिन वो और कर भी क्या सकता था।

शामराव को अब क्या करूँ कुछ समझ नहीं आ रहा था। नज़दीकी मित्र का बेटा था इसलिए बड़े विश्वास के साथ मुहरें रखने के लिए दी तो उसी ने विश्वासघात किया।

शामराव ने बिरबल के और उसके न्याय प्रिय बुद्धि कौशल के बारे में सुना था। इसलिए वह सीधे बिरबल के पास जाकर अपनी व्यथा बिरबल के सामने रखी।

बिरबल ने मामला सुनने के बाद सेवक से उस मुरारीलाल को बुलाने के लिए कहा।

कुछ समय के बाद मुरारीलाल हाज़िर हुआ।

बिराबलने उससे पूछा, “शामरावने क्या तुम्हारे पास मुहरें से भरी थैली रखने के लिए दी थी?”

मुरलीलाल बोला, “नहीं सरकार! ये शामराव चाचा मेरे पिताश्री के बहुत अच्छे दोस्त है। लेकिन पता नहीं क्यों चाचाजी कल से मुझे मुहरों के बारे में पूछ रहे है। मुझे लगता है अब उनके उम्र कि वजह से उनको कुछ गलत फहमी हो गयी होगी।”

तब शामराव बोले, “सरकार मेरी बेटी कि कसम, मैंने मुरारीलाल के पास बेटी के यहाँ जाने से पहले मुहरों से भरी थैली दी थी।”

बिरबल बोला, “लेकिन शामरावजी आपके पास कोई गवाह है जब आपने मुरारीलाल को मुहरें दी थी।”

शामराव बोले, “नहीं सरकार, मैंने तो मुहरों से भरी थैली पीपल के पेड़ नीचे ही मुरारीलाल को दी थी।”

बिरबलने कहा, “शामरावजी फिर गवाह तो है ना, पीपल का पेड़!”

शामराव बोले, “सरकार आप क्या बोल रहे है? मुझ जैसे गरीब का मज़ाक मत उड़ाए। भला पेड़ भी कभी गवाही दे सकता है क्या?”

बिरबलने पेड़ के नाम से लिखित आदेश तैयार करवाया।

बिरबलने कहा, “नहीं शामरावजी, पेड़ सच में गवाही देगा, तुम यह आदेश जाकर उस पेड़ को सुनाओ। पेड़ अपने आप यहाँ गवाही देने आएँगे।”

शामराव को कुछ समझ में नहीं आ रहा था। पर उन्होंने बिरबल कि आज्ञा का पालन करना जरूरी समझा। इसलिए शामराव वह आदेश पत्र लेकर वहाँ से निकल गया।

अब बहुत समय हुआ था लेकिन शामराव वापस दरबार नहीं पहुँचा था।

इसलिए, बिरबल मुरारीलाल से पूछता है, “क्या शामरावजी पेड़ तक पहुँचे होंगे?”

मुरारीलाल बड़े जल्दी में बोल बैठा, “नहीं अभी कहा? वो पेड़ नज़दीक में थोड़ी है!”

बिरबल बोला, “ऐसा क्या?”

शामराव कुछ समय में वापस आता है।

वापस आने पर शामराव बोला, “सरकार मैंने पूरा आदेश सुनाया पर पेड़ कुछ भी नहीं बोला।”

बिरबल बोला, “शामरावजी आप आने से पहले ही पेड़ गवाही देकर चला भी गया।”

तब मुरारीलाल बोला, “क्या बोल रहे है सरकार, में तो यही पर था। यदि, पेड़ यहाँ आया होता तो मुझे नहीं दिखता क्या?”

बिरबल बोला, “अरे मुर्ख मुरारी! तू मुझे फसाने चला था। अगर तुमने पेड़ के नीचे मुजरों से भरी थैली ली नहीं थी तो, वो पेड़ बहुत दूर है, यह बात तुम्हें कैसे पता।”

मुरारीलाल के पास बोलने के लिए अब कुछ नहीं बचा था।

बिरबल आगे बोला, “मुरारीलाल तुम झूठे हो, सबसे पहले शामरावजी कि सारी मुहरें उन्हें वापस करो।”
मुरारीलालने कबुली देके शामराव कि सारी मुहरें वापस कर दी।

बिरबल कि चतुराई से इस मामले का हल निकल गया और शामराव को न्याय मिल गया।

सिख: किसी का विश्वास अर्जित करने के बाद उसके साथ विश्वास घात नहीं करना चाहिए।

अभिमंत्रित लाठी:

आगरा में धनाजीसेठ नाम का एक सोने का बड़ा व्यापारी था। उसे नए-नए अलंकार पहनकर घूमने का बड़ा शौक था। वह समय-समय पर नए गहने खरीदता था। एक साल दीवाली के त्योहार पर उसने बड़ा महँगा हीरेजड़ित हार ख़रीदा। आसपास के पड़ोसियों ने उनसे हार के बारे में पूछते। तब खुशालसेठ भी बड़े गर्व से उन्हें कहते की पाँच हजार मुहरें देकर लिया है।

एक दिन धनाजीसेठ ने नहाने के लिए जाते समय हार को स्नानागार के बहार खूंटी पे लटकाया। नहाकर धनजीसेठ ने स्नानागार से बाहर आके देखा तो पाया कि खूंटी पर लटकाया हार गायब है।

तब धनजीसेठ ने चिल्लाते हुआ कहा, “हे भगवान, मेरा हार कहाँ गया।”

उनके चिल्लाने से वहाँ पत्नी के साथ सारे नौकर जमा हो गए। सब लोग जमा होने के बाद धनजीसेठ बोला, “मैंने, यहाँ खूंटी पर नहाने के लिए जाते वक्त मैंने नया ख़रीदा मेरा सबसे प्रिय हार लटकाया था। लेकिन अब जब में नहाकर बाहर आया तो हार गायब है।”

धनजीसेठ ने नौकरों कि और देखते हुए कहा, “क्या आप लोगों में से किसी ने वो हार देखा? या फिर किसी को अंदर या बहार जाते देखा हो तो बताए?”

तब नौकर बोले, “नहीं मालिक, हम सब तो अपने कामों में व्यस्त थे।”

घर में बहुत तलाशने पर भी धनजीसेठ को वो हार नहीं मिला। अब धनजीसेठ चिंता में पद गया कि हार आखिर गया कहाँ। तब पत्नी के कहने पर धनजीसेठ बिरबल के यहाँ गया और अपनी परेशानी उसको बता दी।

तब बिरबल बोला, “जब चोरी हुई थी तब घर पर कौन-कौन था?”

धनजीसेठ बोला, “तब में, मेरी, पत्नी, और मेरे यहाँ काम करनेवाले चार नौकर थे।”

तब बिरबल को संदेह हुआ कि किसी नौकर ने ही वह हार चुराया होगा।

इसलिए, बिरबलने उन चारों नौकरों को संदेश भिजवाकर हाज़िर होने के लिए कहा।

चारों नौकर आकर बिरबल के सामने खड़े हुए।

अब बिरबलने उन हर एक के हाथ में एक- एक लाठी दी और बोला, “आपके सभी के पास लाठी है उसकी लम्बाई एक ही है। और सभी लाठियाँ एक प्रसिद्ध तांत्रिक द्वारा अभिमंत्रित है। सभी लाठियाँ अब आप घर ले जाए। कल आप इस लाठी के साथ फिर से यहाँ आए। जिसने भी चोरी कि होगी उसकी लाठी कल पाँच इंचों से बड़ी हो जाएगी।”

चारों लाठियाँ लेकर घर तो चले गए। पर जो असल में चोर था, उसके कान में बीरबल कि कही आखिरी बात गूँज रही थी। इसलिए, वह चोर क्या करें इस विचार से पूरी रात सो नहीं पाया। प्रातः के समय उस चोर के मन में एक योजना आयी।

वह चोर बोला, “वाह क्या दिमाग पाया है मैंने यह विचार मेरे मन में पहले क्यों नहीं आया।”

दूसरे दिन धनजीसेठ के साथ चारों नौकर फिर से बिरबल के सामने लाठियों के हुए उपस्थित हुए।
अब बिरबल सबकी लाठियों कि जाँच करने लगा। हार जिसने चोरी किया था उस चोर के पास आते ही, बिरबलने कहा, “हार इसी ने ही चोरी किया है।”

बिरबलने इतने सटीकता के साथ बोलने से वह नौकर बौखला गया। अपना अपराध स्वीकार करने के अलावा दूसरा कोई मार्ग उस चोर को दिखाई नहीं दिया। इसलिए, चोर ने अपना अपराध स्वीकार किया।

तब बिरबल उस चोर कि तरफ देखते हुए कहा, “अरे मूर्ख, लाठियाँ अभिमंत्रित नहीं थी। लेकिन मुझे इतना अवश्य पता था अगर कि लाठियाँ अभिमंत्रित है यह सुनकर, असली चोर लाठी की लंबाई बढ़ेगी इसलिए, लाठी काटकर छोटी करेगा।”

चोर को कुछ सैनिकों के साथ हार लेन के लिए भेजा। कुछ समय में उस चोर ने हार लेकर बिरबल के पास दे दिया। बिरबलने वह हार धनजीसेठ को देते हुए कहा, “धनजीसेठ अब यह हार संभाल कर रखे। दागिनो और अमीरी का प्रदर्शन कर आदमी बड़ा नहीं बनता। व्यक्ति का दूसरों के साथ वाला व्यवहार और सोच ही इंसान को समाज में बड़ा बनाती है।

सिख: धन-संपत्ति का समाज में हद से ज्यादा प्रदर्शन आप ही को संकट में डाल सकता है।

शेर खान कि बुद्धि:

एक दिन अकबर बादशाह और बेगम एकांत में बातें कर रहे थे।

तब बादशाह बोला, “बिरबल ने न जाने कितनी बार उसकी अद्वितीय बुद्धि से मसले चुटकियों में हल किए है। सच में बिरबल मेरे दरबार शान है।”

बेगम बोली, “हाँ मैंने माना कि बहुत बार बिरबल ने मसले हल किए है। लेकिन वह वज़ीर के पद पर है इसलिए काम करता है। आप बेवजह ही बिरबल को इतना महत्व देते है।”

मेरा भाई शेरखान भी किसीसे कम नहीं है। आप तो उसकी तरफ जरा भी ध्यान नहीं देते। आपको उसे भी मौका देना चाहिए। और आप मुझसे जरा भी प्यार करते होंगे तो आप ऐसा जरूर करेंगे।

बादशाह बोला, “तुम कुछ भी कह लो लेकिन बिरबल जैसा सिर्फ बिरबल ही है। फिर भी अगर तुम कहती हो तो में उसका इम्तिहान ले ही लेता हूँ।”

बेगम के कहने पर बादशाह ने शेरखान कि परख करने के लिए सेवक के पास शेरखान को राज महल आने का आदेश दिया।

शेरखान बहुत दूर रहता था इसलिए उसे आने के लिए कुछ दिन लगे। जब शेरखान राज महल पहुँचा उस दिन भी बादशाह और बेगम साथ में बैठकर बातें कर रहे थे। राज महल पहुँचने पर शेरखान बादशाह और बेगम दोनों से मिला।

तब बादशाह बोला, “आईये शेरखान, अभी आप ही की चर्चा हो रही थी।”
तभी सभी को बैलों के गलेके घुंगरू की आवाज सुनाई दिया। तब बादशाह ने राज महल कि खिड़कियों से देखा कि कई सारी बैलगाड़ियाँ एक के पीछे एक जा रही थी। बैलगाड़ियों कि कतार बहुत दूर तक दिखाई दे रही थी।

बादशाह ने शेरखान को आदेश दिया, “जाओ और देखकर आओ कि वो सारी बैलगाड़ियाँ कहाँ जा रही है?”

शेरखान बहुत तेज़ी से गया और तेजी से वापस आया।

वापस आने पर शेरखान बोला, “सरकार सभी बैलगाड़ियाँ पूरब कि और जा रही है।”

इतने तेजी से जाकर आने से बेगम बहुत खुश थी की उसका भाई काम में बिरबल से ज्यादा तेज़ है।

बादशाह ने फिर से सवाल किया, “कितनी बैलगाड़ियाँ है?”

शेरखान फिर से भागकर गया, एक बैलगाड़ीवालें से पूछा कि, “सुनो, आपके पास कुल मिला के कितनी बैलगाड़ियाँ है।” और कुछ समय में वापस लौटा।

आने के बाद शेरखान बोला, “सरकार कुल मिला के एक-सौ दो बैलगाड़ियाँ है।”

शेरखान अब थक गया था, फिर भी बादशाह ने अगला सवाल पूछा, “बैलगाड़ियों में कौन सा माल है?”

लेकिन पसीने लतपत शेरख़ान अब वापस जाने के स्तिती में नहीं था। अब शेरखान परेशान होकर नीचे बैठ गया।

इसलिए बादशाह ने अब बिरबल को बुलाया। कुछ ही देर में बिरबल वहाँ उपस्थित हुआ।

बादशाह ने बीरबल से कहा, “शेरखान अभी थक गए है इसलिए, तुम जरा नीचे जा रही बैलगाड़ियों के पास जाकर उसमे क्या है वो देख के वापस आओ।”

बिरबल वहाँ से चला गया, शेरखान के अभी भी पसीने निकल रहे थे।

बिरबल लगभग एक घंटे बाद आया।

आते ही बादशाह ने बीरबल से पूछा, “तो तुमने पूछताछ की, कि उन बैलगाड़ियों में क्या है?”

तब बिरबल बोला, “जी सरकार, वह सब व्यापार के लिए पूरब के बाजार कि और जा रहे है। वो कुल मिला के एक-सौ दो बैलगाड़ियाँ है। सभी बैलगाड़ियों में अच्छे गुणवत्ता का चावल भरा है। मैंने उसे खुद जाँच कर देखा। उनका मोल भी यहाँ कि तुलना में बहुत काम है। हमारी सरकारी गोदामों में आपातकालीन स्थिति में काम सके इसलिए, अतिरिक्त धान होना चाहिए यह सोच के मैंने वह सारा माल खरीद लिया।”

बिरबल आगे बोला, “अब सारी गाड़ियाँ गोदामों कि और मुड़ गयी है। कोषाध्यक्ष को पैसे देने के लिए कहकर में फिर वापस आता हूँ।”

यह कहकर बिरबल वहाँ से चला जाता है।

यह सब देखकर बेगम के साथ शेरखान भी शर्मिंदा हुआ। अब दोनों के पास बोलनेके लिए कुछ नहीं था।

बेगम ने शेरखान कि और गुस्से से देखकर बोली, “चलिए, आपकी अकल पता चल गयी हमें। निकल जाईये यहाँ से।”

शेरखान शरम के मारे नीचे सिर झुकाए वहाँ से निकल गया।

आखिर में बादशाह बोला, “देखो, पूरे राज्य को और उसके प्रशासन को संभालना इतना आसान नहीं। इसलिए, इतने बड़े पद के लिए एक कर्तव्य दक्ष व्यक्ति ही सही रहेगा। मुझे तुम्हारे भाई के साथ कोई दुश्मनी तो नहीं लेकिन मुझे ऐसी कर्तव्य दक्षता सिर्फ बिरबल में दिखती है। और इसलिए, बिरबल इस पद पर विराजमान है।”

सिख: इंसान को हमेशा जिज्ञासू रहते हुए और चौकसी बुद्धि से काम लेना चाहिए।

लालची सुरजनाथ कि बहादुरी:

राघवेंद्र नमक एक बहुत मेहनतीं व्यक्ति था। जिसने जीवन भर में बहुत धन बचाया था। बहुत ज्यादा मुहरें जमा होने पर उसने सोचा कि इतना धन संभालने से अच्छा है कि कुछ हीरे ले लूँ । यह सोचकर राघवेंद्र ने मुहरों के बदले हीरे ले लिए। एक समय आया जब राघवेंद्र के पास कई हीरे जमा हुए। वह उन सारे हीरो को एक थैली में बाँधकर रखता था।

उसके सारे मित्र उसे बोलते कि, “तुम इतना काम करके हीरे-जवाहरात कमाते हो, लेकिन एक अच्छा घर नहीं बांधते, ऐसा क्यों?”

राघवेंद्र बोला, “मेरे लिए तो मेरी झोपडीही बेहतर है। वैसे भी में अकेला हूँ, इसलिए बड़ा घर बांध के क्या करूँगा?”

फिर एक दिन से झोपड़ी को आग लग गयी। राघवेंद्र और कुछ पड़ोसियों ने आग बुझाने का बहुत प्रयास भी किया पर सब प्रयास विफल साबित हुए। अब आग ने पूरी झोपड़ी को अपनी चपेट में ले लिया।

तब राघवेंद्र को पता चला कि उसकी जीवन भर कि पूँजी अंदर ही रह गयी।

राघवेंद्र अब चिल्लाने लगा, “अरे, मेरे हीरे अंदर रह गए! कोई अंदर से मेरे हीरे लाओ।”

राघवेंद्र जब हीरे-हीरे करके चिल्ला रहा था, उसी समय एक अतिलोभी इंसान वहाँ से गुजर रहा था। उस इंसान का नाम था सुरजनाथ।

सुरजनाथ ने राघवेंद्र से पूछा, “कहाँ है हीरे? में उस बाहर लाऊंगा?”

राघवेंद्र ने बताया, “खिड़की के पास पड़े मटके में एक थैली रखी है उसी में सारे हीरे है।”

सुरजनाथ ने अंदर जाने से पहले राघवेंद्र के साथ सौदा किया, “में वो हीरो कि थैली बाहर लाऊंगा लेकिन मुझे उसमे से जो पसंद आएगा वही में तुम को दूँगा।”

राघवेंद्र ने सौदा मंज़ूर करते हुए बोला, “ठीक है, ला दो हीरो कि थैली!”

लालची सुरजनाथ झोपड़ी के अंदर घुसा, बहुत कठिनाई के बाद वह हीरो कि थैली तक पहुँचा। सुरजनाथने वह हीरे से भरी थैली उठाई और कुछ समय में बाहर आया।

बाहर आने के बाद उसने राघवेंद्र को हीरे दिखाए।

राघवेंद्र बोला, “तुम्हारा बहुत-बहुत धन्यवाद! तुमने मेरी जीवन भर किए मेहनत कि कमाई बचाई।”

सुरजनाथ ने सारे हीरे एक दूसरे थैली में रखे और थैली राघवेंद्र को दी।

राघवेंद्र ने पूछा, “अरे, क्या कर रहे हो, दोस्त? हीरे तो मेरे है और तुम सारे ही हीरे ले रहे हो?”

तब सुरजनाथ ने कहा, “हमने तो पहले ही सौदा किया था कि मुझे इसमें से जो भी पसंद होगा वो में तुम्हें दे दूँगा।”

राघवेंद्र बोला, “तुम ये क्या कह रहे हो, मुझे लगा तुम जो तुम्हें पसंद आएँगे वो हीरे देने की बात कर रहे हो। ये तो सरासर धोखा है।”
सुरजनाथ बोला, “धोखा! कैसा धोखा? मैंने आग में कूदकर ये हीरे वापस लाया हूँ। इसलिए अब ये हीरे मेरे है।”

राघवेंद्र बोला, “हाँ मैंने माना कि तुमने बहाद्दुरी दिखाते हुए आग में कूदकर हीरे बहार लाए है। इसलिए, हम दोनों ये हीरे आधे-आधे आपस में बाँट लेते है।”

सुरजनाथ बोला, “ऐसा- वैसा कुछ नहीं चलेगा। में तो चला।”

राघवेंद्र परेशान होकर बिरबल के यहाँ न्याय माँगने के लिए गया।

बिरबाल ने पूरा मामला समझा और सुरजनाथ को हाज़िर रहने के लिए आदेश पत्र भिजवाया। कुछ समय के बाद सुरजनाथ वहाँ आया।

बिरबल ने उसे पूछा, “राघवेंद्र ने तुम्हारे खिलाफ शिकायत कि है की तुमने उसके सारे हीरे ले लिए है। क्या यह बात सच है?”

सुराजनाथ बोला, “जी सरकार! लेकिन मैंने वो हीरे झोपड़ी को लगे आग में कूदकर बाहर निकाले थे।”

बिरबल ने पूछा, “आग में से हीरे बाहर लाने से पहले तुम दोनों में क्या तय हुआ था?”

सुरजनाथ बोला, “तय हुआ था कि मुझे भी पसंद होगा वो में उसे दे दूँगा।”

बिरबल ने राघवेंद्र से पूछा, “क्या, सुरजनाथ जो कुछ बोल रहा है, क्या वो सच है?”

राघवेंद्र बोला, “हाँ सरकार! लेकिन वो मुझे सिर्फ थैली देकर खुद सारे हीरे ले रहा है।”

बिरबल ने सुरजनाथ से फिर से पूछा, “सुराजनाथ तुम्हें क्या पसंद है। ”

सुरजनाथ ने झट से जवाब दिया, “हीरे सरकार!”

फिर बिरबल ने कहाँ, “ठीक है, तो सौदे के मुताबिक तुम्हारे पसंद के सारे हीरे तुम राघवेंद्र को दे दो, और थैली तुम्हारी।”

बिरबल ने लालची व्यक्ति सुरजनाथ को शब्दों के जाल में फसाकर राघवेंद्र को न्याय दिलाया। राघवेंद्र को न्याय मिलने से वह बहुत खुश हुआ। लेकिन सुरजनाथ लोभी अवश्य था, लेकिन उसने बड़े साहस का परिचय देते हुए आग में जाकर हीरे लाए थे। इसलिए, राघवेंद्र ने उसे उसके बदले दस हीरे दिए।

सिख: हर व्यक्ति को किसी न किसी चीज का लालच होता है। लेकिन हद से ज्यादा लालच किसी काम का नहीं होता। ऐसे अतिलोभी व्यक्ति को जीवन में जितना भी मिले कम लगता है। इसलिए, ऐसे व्यक्ति के हाथ हमेशा निराशा लगती है।

धोकेबाज़ मित्र:

गोविंद राम दुर्गापुर नमक छोटे गाँव में रहता था। उसकी एक गाय थी जिससे वह बहुत प्यार करता था। गोविंद राम खेती करके अपना गुजरा करता था। एक वर्ष उनके गाँव में बारिश नहीं होने के कारण अकाल पड़ गया। इसलिए, गोविंद राम ने अपने दिल पे पत्थर रखकर गाय को बेचने का फैसला किया।
गाय बेचने के लिए वह पास वाले शहर कि और निकला। शहर पहुँचने पर गोविंद राम बाजार कि और निकला। गोविंद राम बाजार पहुँचने पर उसे सुशेन नाम का एक दोस्त मिला।

तब सुशेन ने गोविंद राम से पूछा, “क्या गोविंद राम, आज शहर कि और प्रस्तान, कुछ ख़ास प्रयोजन?”

गोविंद राम ने अपनी गाँव कि व्यथा सुशेन को बताते हुए कहा, “गाँव में अकाल के कारण फसल हुई नहीं। तो घर चलाने के लिए मेरी प्यारी गाय ही थी, जो अब में बेचने जा रहा हूँ।”

यह सुनकर सुशेन बोला, “तीन महीनों पहले मैंने सूरजमल कि गाय बेची थी। जिसके कारण उसे बाजार के भाव से लगभग दस मुहरें ज्यादा मिले थे।”

गोविंद राम बोला, “फिर अच्छा हुआ मित्र, तुम मुझे रास्ते में ही मिल गए। में अभी बाजार गाय बेचने ही जा रहा हूँ। तो अगर तुम मेरे साथ में आओगे तो मेरी बड़ी मदत होगी।”

सुशेन बोला, “हाँ-हाँ क्यों नहीं।”

दोनों बाजार की और निकल पड़े। कुछ ही देर में दोनों बाजार पहुँचते है। सुशेन अब आते-जाते लोगों को गाय की ख़ासियत बताने लगा, “देखो पूरे बाजार में ऐसी गाय नहीं मिलेगी। इस गाय का दूध अमृतसमान है। इसके गोबर से आपके खेतो में खाद कि कमी नहीं रहेगी।”

सुशेन ऐसे बोल रहा था जैसे उसके खुद कि गाय हो। लेकिन गोविंद राम ने इसे सरलता से लिया।

कुछ और ग्राहक कि तलाश करने के उद्देश्य से गोविंद राम ने से सुशेन बोला, “में बाजार में घूम कर और ग्राहक खोजता हूँ और मिले तो यहाँ लेकर आता हूँ। तब तक तुम यही गाय के साथ ही रहना।”

गोविंद राम बाजार में घूम कर कुछ ग्राहकों को अपनी गाय दिखाने के लिए लेकर आता है। लेकिन लौटने पर गोविंद राम देखता है कि, “सुशेन और गाय दोनों अपनी नियत जगह पर नहीं थे।”

गोविंद राम ने फिर पूरे बाजार में उन दोनों को खोजा पर ना सुशेन का कुछ पता था और ना गाय का। फिर गोविंद राम सुशेन के घर गया। तब उसने देखा कि सुशेन के घर के बाहर गाय बंधी थी। गोविंद राम को देख के गाय ने जोर से हंबरना शुरू किया।

गोविंद राम सुशेन के घर का दरवाजा खटकाया। सुशेन को देख के गोविंद राम बोला कि, “क्या सुशेन मैंने तुम्हें पूरे बाजार में कितना खोजा और तुम तो यहाँ पर हो? अगर तुम्हें ही मेरी गाय खरीदनी थी तो मुझसे कहा क्यों नहीं?”

सुशेन बोला, “किसकी गाय मुझे बेचने आए हो गोविंद राम?”

गोविंद राम बोला, “अरे तुमने जो तुम्हारे आँगन में गाय बाँधी है, उसी गाय कि में बात कर रहा हूँ, जो मेरी है। और कुछ देर पहले जब हम दोनों बाजार उस गाय को बेचने गए थे, तब तुम अचानक से वहाँ से चले आए।”

तब सुशेन बोला, “तुम ये क्या बोल रहे हो मुझे कुछ भी समझ नहीं आ रहा।“मेरे गाय पर हक़ जताने वाले तुम होते कौन हो। पहले तुम यहाँ से निकल जाओ।”

सुशेन ने अपमान करते हुए गोविंद राम को अपने घर से निकाला। तब वह दरबार में बादशाह के सामने न्याय माँगने गया। उसने सारा मामला बादशाह अकबर के सामने दरबार में सुनाया। तब बादशाह अकबर ने मामला बिरबल के पास सौंपा।

बिरबल ने दरबार में ही पूरा मामला सुना था। इसलिए, उसने बिना वक्त गमाये सुशेन के साथ गाय को भी दरबार के बाहर उपस्थित रहने के लिए कहा।

कुछ देर के बाद, दोनों दरबार के बाहरी प्रांगण में उपस्थित हुए। बिरबल और गोविंद राम भी दरबार के बाहर आए।

सुशेन बोला, “सरकार यह मेरी ही गाय है। यह गोविंद राम मेरे तरक्की पर जलता है। शायद इसलिए, वह मेरे गाय को अपनी कह के उस पर अपना हक़ जता रहा है।”

बिरबल ने पूछा, “गाय का नाम क्या है?”

सुशेन बोला, “कावेरी।”

बिरबल बोला, “आप दोनों उस बरगद के पेड़ के नीचे जाकर गाय को बुलाइये।”

दोनों बरगद के पेड़ के नीचे गए। सुशेन ने शीग्रता से गाय को पुकारा, “कावेरी….कावेरी।”

पर गाय वही के वही थी, वह अपनी जगह से थोड़ी भी नहीं हीलि।

फिर गोविंद राम ने गाय को पुकारा, “सरस्वती….सरस्वती।”

तब गाय झट से दौड़ते-दौड़ते गोविंद राम के पास गयी। गोविंद राम ने उसे हाथों से सहलाया, गाय ने भी उसका तन गोविंद राम के शरीर से घिसाया।

बिरबल के इस छोटे से प्रयोग से गाय का असली मालिक पता चला। सुशेन को उसके किए अपराध के लिए जुर्माना भरना पड़ा। इसतरह से यह मामला भी सुलझा कर बिरबल ने अपने चातुर्य का परिचय।

सिख: किसी भी व्यक्ति पर बहुत जल्दी विश्वास करना आपके लिए घातक साबित हो सकता है।

गधे की हजामत:

दुर्गमपूर नाम के एक गाँव में रायबा नाम का लकड़हरा रहता था। वो हर रोज जंगल में लकडिया तोड़ने जाता। उससे ही उसका उदर्निर्वाह चलता था। रायबा के पास जंगल से लकड़िया लाने के लिए बंकी नाम का एक गधा था।

एक दिन न्हायी का व्यवसाय करनेवाले सुरज ने उसे पुकारा।

रायबा को पुकारने पर रायबा ने पूछा, “क्यों लकडिया लेनी है क्या?”

सुरज ने पूछा, “क्या मोल है लकड़ीयों का?”

रायबा बोला, “ज्यादा नहीं सिर्फ बिस मुहरें।”

सुरज बोला, “पैसे तो ठीक है; लेकिन यह मोल तुम्हारे साथ है या सिर्फ लकड़ियों का है?”

रायबा बोला, “क्या गरीब का मजाक उडा रहे हो आप। आप कितने देंगे।”

सूरज बोला, “दस मुहरे दूँगा।”

रायबा ने दस मुहरों में लकडिया देने के लिए तैयार हुआ। उसने गधे कि पीठ पर से सारी लकडिया नीचे उतारी और मुहरें लेने के लिए वही खड़ा रहा।

सुरज बोला, “अरे, तुमने जैसे तय हुआ था वैसे सारी लकडिया कहा दी?”

सुरज आगे बोला, “क्या तुम मेरे साथ धोखा कर रहे हो?”

रायबा को कुछ समझ में नहीं आया।

रायबा बोला, “आप क्या बोल रहे हो, मैंने तो सारी लकडिया दी है?”

सुरज बोला, “तुम झूठे हो तुमने अपने कुल्हाड़ी का डण्डा नहीं दिया, वो भी तो लकड़ी ही है। तुमने तुम्हारे पास की सारी लकडिया दूँगा ऐसा कहा था।”

सुरज ने ज़बरदस्ती करके रायबा से उसके कुल्हाड़ी का डण्डा भी ले लिया।

इस तरह का गैरव्यवहार होने से दुखी रायबा बिरबल के पास गया और अपनी व्यथा बताई। बिरबल ने पूरी घटना को समझ कर एक युक्ती निकाली।

कुछ दिनों बाद रायबा अपने गधे पर सवार होकर उस न्हाई सूरज के दुकान के पास गया।

रायबा ने सूरज के पास जाकर बोला, “परसो ही मेरी शादी है इसलिए मेरे साथ मेरे दोस्त के भी बाल कटवाने है। में तुम्हें जितने चाहिए उतने मुहरें दूँगा।”

रायबा ने खुद ऐसा बोलने पर लालची सूरज ने मन ही मन रायबा को लुटाने का विचार किया।

सुरज बोला, “में ऐसे तो एसेवैसे लोगों के काम नहीं करता; लेकिन तुम्हारा विवाह है इसलिए तुम्हारे और तुम्हारे मित्र कि हजामत कर दूँगा।”

सुरज काम करने के लिए कबूल होने पर सुरज ने रायबा के केश काटना शुरू किया।

रायबा कि हजामत पूरी होनेपर सुरज बोला, “अब बुलाओ अपने दोस्त को।”

रायबा बाहर कि और इशारा करते हुए बोला, “वो रहा, वो बाहर खड़ा है, मेरा दोस्त!”

सुरजने बाहर कि और देखा बाहर तो वहाँ गधे के अलावा कोई भी व्यक्ति नहीं था।

सुरजने फिर रायबा से पूछा, “अरे, बाहर तो कोई भी नहीं है?”

रायबा बोला, “अरे ठीक से देखिए श्रीमान, मेरे दोस्त का यूँ अपमान ना करें! वो रहा मेरा दोस्त बंकी!”

अब सुरजने बहुत गुस्से से पूछा, “अब तुम मुझसे गधे कि हजामत कराओगे, क्या तुम्हें में बेवकूफ़ लगता हूँ।”

तब रायबा बोला, “मेरी और मेरे दोस्त कि हजामत करोगे ये पहले ही तय हुआ था।”

सुरज अब गुस्से से लाल होकर बोल रहा था। लेकिन रायबा एकदम शांति से अपनी बात रख रहा था। तब उसी समय बिरबल के योजना के मुताबिक वह खुद वहाँ आए।

अब सुरज को लगा कि बिरबल मुझे इस मामले से जरूर छुटकारा दिलाएंगे।

सूरज ने बिरबल के सामने अपनी बात रखी, “सरकार, आप ही बताए, में गधे कि हजामत कैसे करूँ।”

तब बिरबल बोला, “अगर तुम लकड़ियों के साथ कुल्हाड़ी का डण्डा पर भी अपना हक़ जता सकते हो। तो अब तुम्हे रायबा के मित्र कि हजामत करनी ही होगी।”

बिरबल ने आदेश देने पर सुरज के पास गधे कि हजामत करने के सिवा कोई और चारा नहीं था। सुरज को सब लोगों के सामने गधे की हजामत करनी पड़ी।

बिरबल ने युक्ती से सूरज को अच्छा पाठ पढ़ाया। उसके बाद सुरज पूरी तरह से बदल गया और उसने किसी व्यक्ति को धोखा नहीं दिया।

सिख: किसी भी व्यक्ति के साथ छलकपट करके उसे धोखा नहीं देना चाहिए। अन्यथा, एक दिन आपके साथ भी किसी दिन ऐसा छल हो सकता है, जिससे आप किसी और के साथ धोखा करने योग्य नहीं रहोगे।

खास तोता:

एक बार बादशाह अकबर के महल एक फ़क़ीर आया। जिसने बादशाह को राज्य के तरक्की के विषय में कुछ भविष्यवाणियाँ कि और साथ में कुछ सुझाव भी दिए। फ़क़ीर ने कुछ ही समय में बादशाह का विश्वास जीत लिया।
जाते-जाते उस फ़क़ीर ने बादशाह को एक तोता भेट दिया। जिसकी देखभाल करने के लिए बादशाह ने एक सेवक कि नियुक्ति की।

उस फ़क़ीर ने महल से निकलते समय कहा था कि, “यह तोता तुम्हारे राज्य में स्वर्णिम युग लाएगा और इसके कारण तुम्हारा राज्य विश्व का सबसे शक्तिशाली राज्य बनेगा।”

उस तोते से कुछ ही दिनों में बादशाह बहुत अच्छे से घुल-मिल गए। बादशाह जब भी तोते से मिलने जाते तब सेवक से तोते कि अच्छे से देखभाल करने के लिए कहते।

दिन बितते गए, अब बादशाह हर रोज कम से कम एक बार तो तोते से मिलने के लिए आते ही थे। एक बार बादशाह ने तोते को मिर्च खिलाते समय उस सेवक से कहा, “अच्छी तरह से तो ध्यान दे रहे हो ना! ध्यान में रखना अगर इस तोते को कुछ हो गया तो अपने प्राणों से हाथ धो बैठोगे!”

बेचारा सेवक बादशाह कि बातें सुनकर बहुत घबरा गया, अब वो उस तोते का और ज्यादा ध्यान रखने लगा।

कुछ दिनों बाद एक दिन सुबह-सुबह सेवक तोते को दाना-पानी डालने के लिए आया। तब उस नोकर ने देखा कि तोता निश्चिंत पड़ा है, और उसकी कोई हलचल भी नहीं दिख रही थी। सेवक ने जाँच करने पर पता चला की वह तोता मर चुका है। तोते के मरने से मानो उस सेवक के ही प्राण निकल गए। नोकर को कुछ समझ नहीं आ रहा था अब क्या करें। तब सोचते-सोचते उस नोकर के मन में बिरबल के पास जाने का विचार आया। वह नोकर एक क्षण कि भी देरी न करते हुए बिरबल के यहाँ गया।

बिरबल को अपनी व्यथा बताने के बाद नोकर बोला, “बिरबलजी कुछ भी करके मुझे महाराज से प्राणदान दिलवाइये, में आपका जीवन भर आभारी रहूँगा।”

बिरबल ने नोकर से कहा, “तुम चिंता मत करो। में बादशाह से बात करूँगा।”

बिरबल बादशाह अकबर के सामने जाते ही बोला, “सरकार, आपका तोता…..”

बादशाह बोला, “मेरा तोता! क्या हुआ मेरे तोते को?”

बिरबल ने आगे कहा, “कुछ खास नहीं सरकार। आपका तोता अब बहुत बड़ा योगी बन गया है। आकाश कि और देखते हुए वह दोनों आंखे बंद कर ध्यान कर रहा है। अपनी जगह से थोड़ा भी नहीं हिल रहा।”

अकबर कि बातें बादशाह को समझ में नहीं आयी। इसलिए दोनों तोते के पिंजरे के पास चले आए।

पिंजरे के पास आते ही अकबर बादशाह को पता चला कि तोता मर चुका है।

बादशाह अकबर ने बिरबल से कहा, “बिरबल, तुम अपने आप को इतना चतुर समझते हो और तुम्हें तोता जिंदा है या नहीं ये भी नहीं समझ आ रहा। सीधा-सीधा कह देते कि तोता मर गया है, इतनी घुमाफिराकर बोलने कि क्या जरूरत थी।”

तब बिरबल बादशाह से बोला, “सरकार बताता भी तो कैसे? क्योंकि ‘तोता मर गया’ ऐसा समाचार देनेवाले को आप देहदंड कि सजा सुनाने वाले है।”

अब बादशाह को सब समझ में आ गया। अब बादशाह अकबर बिरबल के इस चतुराई पर हँसने लगा।

सिख: नौकरों से कौन सा भी आदेश पूरे होश में रहकर ही देना चाहिए। और सभी को सृष्टि के सार्वभौम सत्य को पहले से स्वीकार करना चाहिए।

पढ़िए कैसे ली अकबर बादशाहने बिरबल कि परीक्षा

बिरबल के तपस्वी गुरु:

एक बार अकबर बादशाह और बिरबल बाहर भ्रमण कर रहे थे।

तब बादशाह अकबर ने बिरबल से पूछा, “बिरबल तुम बहुत बुद्धिमान हो, तो तुम्हारे गुरु तो बहुत ज्यादा बुद्धिमान होंगे। इसलिए, मेरी इच्छा है कि में एक बार तुम्हारे गुरु से भेट करूँ।”

सच कहूँ तो बिरबल का कोई गुरु था ही नहीं। इसलिए, बादशाह से क्या कहूँ बिरबल को समझ नहीं आ रहा था।

पर बिरबल ने सोचकर उसी समय बादशाह से कहा, “सरकार, मेरे गुरु तो वर्षों से हिमालय में तपस्या में लीन रहते है। इसलिए, वो कब लौटेंगे यह बता नहीं सकता।”

फिर बादशाह अकबर ने आदेश दिया, “वो मुझे कुछ पता नहीं बिरबल, अगले तीन महीनों के अंदर मुझे तुम्हारे गुरु से भेट करनी है। और मेरी उनसे भेट करवाने कि ज़िम्मेदारी अब तुम्हारी।”

बिरबल के सामने अब बहुत बड़ा प्रश्न था कि, अब करे तो करे क्या? क्योंकि, उसका गुरु तो कोई है ही नहीं। तब, बिरबल ने एक युक्ति निकाली। बिरबल ने पास वाले गाँव से एक बहुत मेहनती और ईमानदार व्यक्ति को सेवक से कहकर बुलाया। सेवक ने मानिकलाल नाम के एक मेहनती व्यक्ति को बिरबल के सामने हाजिर किया।

आने के बाद, बिरबल ने मानिकलाल से कहा, “देखो में तुम्हें एक काम दूँगा, अगर तुमने वह ढंग से किया तो में तुम्हें डेढ़ सौ मुहरें पुरस्कार में दूँगा।”

बिरबल ने मानिकलाल का रूप बदलने हेतू, शृंगार करनेवाले कलाकार को बुलाया। उसने माणिकलाल को भगवे कपड़े पहनाये, नकली दाढ़ी-मूँछे लगाई। उस कलाकार ने मानिकलाल का रूप पूरी तरह से बदलकर एक तपस्वी साधु के जैसा कर दिया।

अब बिरबल ने उस मानिकलाल को पास वाले मंदिर के बाहर हाथ में माला लिए, बैठकर साधना करने के लिए कहा।

बिरबल ने पूरी बात समझाते हुए कहा, “देखो मानिकलाल, मंदिर में बैठने के कुछ देर बाद वहाँ बादशाह आएँगे। जो तुम्हें बहुत कुछ देने का लालच देंगे। फिर भी तुम को चुप ही रहना है। अगर तुमने गलती से भी मुँह खोला और तो तुम असल में कौन हो यह बात सामने आयी, तो तुम्हें बादशाह फाँसी से कम सजा तो हरकिज नहीं देंगे।”

मानिकलाल को पूरी बात समझाने के बाद बिरबल बादशाह के पास गया।

बिरबल ने बादशाह अकबर से कहा, “सरकार, मेरे गुरु गाँव के बाहर जो मंदिर है वहाँ रुके है। आज रात को वो वाराणसी प्रस्थान करेंगे। इसलिए, आज ही आपको उन्हें मिलने के लिए चलना होगा।”

बादशाह और बिरबल दोनों लगभग एक प्रहार बाद उस मंदिर पहुँचे जहाँ मानिकलाल माला लिए जाप करते हुए बैठा था। बिरबल के गुरु होने के वजह से बादशाह ने तपस्वी को झुक कर नमन किया। तपस्वी के भेस में माणिकलाल को लगा अरे वाह! इतना बड़ा बादशाह मेरे सामने झुक रहा है। फिर उसे बिरबल कि कही बात याद आ गयी इसलिए, वह चुप रहा।

बादशाह ने तपस्वी मानिकलाल से कहा, “साधु महाराज में आपके आशीर्वाद कि तलाश में आया हूँ। इसलिए, मुझे आशीर्वाद दे के कृतार्थ करें।”

तपस्वी मानिकलाल ने फिर अपने दोनों हाथ ऊपर करके बादशाह को आशीर्वाद दिया। बादशाह ने पीछे खड़े रहकर कुछ समय इंतजार करने के लिए कहा।

बादशाह ने तपस्वी मानिकलाल से कहाँ, “आप कुछ मुझे राज काज चलाने के लिए मार्गदर्शन करें ऐसी मेरी बहुत इच्छा थी। तो आप कुछ मुझे मार्गदर्शन करेंगे।”

लेकिन तपस्वी माणिकलाल कुछ भी नहीं बोला।

फिर बादशाह ने सेवक से कहकर गहनों, हिरे, मोती, पाचू, आदि मौल्यवान रत्नों से भरा संदूक तपस्वी माणिकलाल के सामने रखा।

अब मानिकलाल को अंदर से लगता था कुछ बोलू, फिर बिरबल ने समझायी बातें याद आती थी। जिसके कारण माणिकलाल चुप ही रहा।

अब बादशाह को थोड़ा गुस्सा आ गया, बादशाह ने बिरबल से कहा, “बिरबल ये क्या तुम्हारे गुरु एक शब्द भी बोल नहीं रहे। यह हमारा अपमान है, इसलिए, में यहाँ, एक भी पल और नहीं रुक सकता।”

थोड़े गुस्से में ही बादशाह अकबर राज महल वापस लौटे। थोड़ी देर बाद बिरबल भी वहाँ पहुँचा।

बादशाह ने बड़े गुस्से के साथ बिरबल से पूछा, “क्यों बिरबल, अगर कोई बेवकूफ़ मिला तो क्या करना चाहिए।”

बिरबल ने झट से जवाब दिया, “चुप रहे।”

बिरबल के जवाब से बादशाह को शर्मिंदगी महसूस हुई। बादशाह को लगा कि, बिरबल के गुरु ने हमें मूर्ख समझा और हमसे बात नहीं कि। यह सोचकर बादशाह ने फिर से भविष्य में बिरबल के गुरु के बारे में कभी भी चर्चा नहीं कि।

सिख: किसी व्यक्ति को अगर बताना नहीं हो तो, किसी भी व्यक्ति को व्यक्तिगत जानकारी जानने के लिए ज़बरदस्ती नहीं करनी चाहिए।

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